पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव, विधानसभा से दो संशोधन विधेयक पारित

  • पिछड़ा वर्ग आयोग को मिले व्यापक अधिकार, नई व्यवस्था में केवल 66 समुदायों को मिलेगा आरक्षण का लाभ
  • उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप बदला कानूनी ढांचा, नई प्रक्रिया में आवेदन और आपत्ति दर्ज कराने की भी व्यवस्था

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा ने सोमवार को अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करने वाले दो महत्वपूर्ण संशोधन विधेयकों को पारित कर दिया। इन विधेयकों के माध्यम से राज्य की आरक्षण व्यवस्था के कानूनी ढांचे में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। नई व्यवस्था के तहत पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग को पहले की तुलना में अधिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जबकि पूर्ववर्ती सरकार के समय अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों की सूची को दी गई वैधानिक मान्यता समाप्त कर दी गई है। सरकार का कहना है कि यह निर्णय उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुरूप पारदर्शी और विधिसम्मत आरक्षण व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लिया गया है।
नई व्यवस्था में सीमित समुदायों को मिलेगा लाभ
संशोधित कानून के अनुसार अब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से अलग केवल 66 समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ मिलेगा। इनमें 54 हिंदू तथा 12 मुस्लिम समुदाय शामिल हैं। इसके साथ ही 77 मुस्लिम समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग सूची से बाहर कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि यह निर्णय मई 2024 में कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उस आदेश के अनुपालन में लिया गया है, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग सूची तैयार करने की पूर्व प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठाए गए थे।
विधानसभा में पारित हुए दोनों संशोधन
राज्य के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरीशंकर घोष ने विधानसभा में पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अतिरिक्त) सेवाओं एवं पदों में रिक्तियों के आरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2026 तथा पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026 प्रस्तुत किए। चर्चा के बाद सदन में मत विभाजन कराया गया, जिसमें दोनों विधेयकों को बहुमत से स्वीकृति मिल गई। मतदान में 186 सदस्यों ने विधेयकों के पक्ष में मतदान किया, जबकि 17 सदस्यों ने विरोध किया। छह सदस्य मतदान की प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए।
पुरानी सूची की वैधानिक मान्यता समाप्त
पूर्व व्यवस्था के अंतर्गत अनुसूची-1 में अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी ‘अ’ के अंतर्गत 65 तथा श्रेणी ‘ब’ के अंतर्गत 78 समुदायों को वैधानिक मान्यता प्राप्त थी। नए संशोधन के बाद इस अनुसूची को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। अब किसी भी समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने अथवा हटाने की प्रक्रिया केवल पिछड़ा वर्ग आयोग की अनुशंसा के आधार पर पूरी की जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे आरक्षण प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनेगी।
सरकार ने बताया संशोधन का उद्देश्य
मंत्री गौरीशंकर घोष ने विधानसभा में कहा कि सरकार ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में वर्ष 1993 की मूल अन्य पिछड़ा वर्ग सूची को पुनः लागू करने का वादा किया था। उनके अनुसार पूर्ववर्ती सरकार ने आयोग की समुचित जांच के बिना अनेक समुदायों को सूची में शामिल किया था, जिसके कारण पूरी प्रक्रिया न्यायिक परीक्षण में टिक नहीं सकी। उन्होंने कहा कि वर्तमान संशोधन का उद्देश्य आयोग की भूमिका को मजबूत बनाना और कानूनी प्रक्रिया का पूर्ण पालन सुनिश्चित करना है।
आयोग को मिले नए अधिकार
संशोधित कानून के अनुसार अब राज्य सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह के आधार पर आरक्षण का प्रतिशत निर्धारित करेगी तथा आवश्यकतानुसार उसमें समय-समय पर परिवर्तन भी कर सकेगी। हालांकि कुल आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। आयोग को विभिन्न समुदायों के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का अध्ययन कर उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत करने का अधिकार भी प्रदान किया गया है। इसके अतिरिक्त अब कोई भी पात्र व्यक्ति अथवा समुदाय अन्य पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकेगा। यदि किसी समुदाय को गलत तरीके से सूची में शामिल किया गया है अथवा हटाया गया है, तो उसके विरुद्ध आपत्ति भी दर्ज कराई जा सकेगी। आयोग द्वारा दी गई अनुशंसाओं का पालन राज्य सरकार के लिए अनिवार्य होगा।
उच्च न्यायालय के निर्णय की पृष्ठभूमि
मई 2024 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने वर्ष 2010 के बाद जारी किए गए सभी अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्रों को निरस्त कर दिया था। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने की प्रक्रिया कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं अपनाई गई थी तथा पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका की अनदेखी की गई थी। सरकार का कहना है कि वर्तमान संशोधन उसी कमी को दूर करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
आरक्षण प्रतिशत और राजनीतिक बहस
नई सरकार ने सत्ता संभालने के बाद राज्य में 66 अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों के लिए आरक्षण का प्रतिशत 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया था। इस निर्णय को लेकर राजनीतिक स्तर पर व्यापक चर्चा हुई। सरकार का तर्क है कि यह बदलाव न्यायालय के निर्देशों तथा वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप किया गया है, जबकि विपक्ष ने इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया है। मत विभाजन के दौरान भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा के विधायक नौशाद सिद्दीकी ने ध्वनि मत के स्थान पर मत विभाजन की मांग की, जिसे विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद औपचारिक मतदान के माध्यम से दोनों विधेयकों को पारित किया गया। पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा पारित ये दोनों संशोधन विधेयक राज्य की अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन माने जा रहे हैं। नई व्यवस्था में पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाकर आरक्षण प्रक्रिया को पारदर्शी, विधिसम्मत और न्यायिक मानकों के अनुरूप बनाने का प्रयास किया गया है। आने वाले समय में इन संशोधनों का प्रभाव राज्य की आरक्षण नीति, प्रशासनिक नियुक्तियों और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर व्यापक रूप से दिखाई देने की संभावना है।

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