August 29, 2026

बिहार में 800 शिक्षकों पर शिकंजा, बिना मंजूरी पढ़ाई पर कार्रवाई

  • पीएचडी समेत नियमित पाठ्यक्रम करने वालों की होगी जांच, निलंबन से वेतन वृद्धि रोकने तक की तैयारी
  • फर्जी हाजिरी के आरोप भी सामने आए, विश्वविद्यालयों से रिकॉर्ड लेकर होगी पूरी पड़ताल

पटना। बिहार के सरकारी स्कूलों में कार्यरत करीब 800 शिक्षकों पर शिक्षा विभाग की जांच का शिकंजा कसने जा रहा है। बिना विभागीय अनुमति के नौकरी के साथ नियमित रूप से पीएचडी, एमए, एमएससी, एलएलबी और एमएड जैसे पाठ्यक्रम करने वाले शिक्षकों के खिलाफ अब सख्त कार्रवाई की तैयारी है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि शिक्षकों को अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ाने की अनुमति है, लेकिन इसके लिए पहले विभाग से स्वीकृति लेना और स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित नहीं होने देना जरूरी है। विभागीय जांच में ऐसे कई मामले सामने आने के बाद कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। आरोप है कि कुछ शिक्षक बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के विश्वविद्यालयों में नियमित पाठ्यक्रमों में नामांकित हैं। नियमित पाठ्यक्रम में कक्षाओं के लिए शिक्षक को संस्थान में मौजूद रहना पड़ता है। ऐसे में उनकी स्कूल में उपस्थिति और विद्यार्थियों की पढ़ाई को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
स्कूल में हाजिरी, बाहर नियमित पढ़ाई
जांच के दौरान कुछ शिक्षकों पर आपसी सांठगांठ से हाजिरी लगाने के आरोप भी सामने आए हैं। आरोप है कि शिक्षक नियमित पाठ्यक्रम के लिए दूसरे शहरों में रहते हैं, लेकिन स्कूल के अभिलेख में उनकी उपस्थिति दर्ज होती रहती है। कुछ मामलों में स्कूल के अन्य कर्मचारियों को मोबाइल देकर उनकी ओर से हाजिरी दर्ज कराने की बात भी जांच में सामने आई है। यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला केवल बिना अनुमति उच्च शिक्षा हासिल करने तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसे शिक्षकों पर फर्जी उपस्थिति दर्ज कराने और सरकारी सेवा नियमों के उल्लंघन का मामला भी बन सकता है। इससे स्कूलों में शिक्षकों की वास्तविक उपलब्धता और विद्यार्थियों की पढ़ाई पर भी गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
प्रखंड से लेकर विश्वविद्यालय तक होगी जांच
शिक्षा विभाग अब प्रखंड स्तर से संबंधित शिक्षकों की रिपोर्ट जुटाने की तैयारी में है। इसके बाद शिक्षकों के नामांकन और पढ़ाई से जुड़े रिकॉर्ड संबंधित विश्वविद्यालयों से मंगाए जा सकते हैं। विश्वविद्यालयों से प्रवेश, कक्षाओं में उपस्थिति और पाठ्यक्रम से संबंधित दस्तावेजों की जानकारी लेकर विभागीय रिकॉर्ड से उनका मिलान किया जाएगा। जांच में यह भी देखा जाएगा कि शिक्षक ने संबंधित पाठ्यक्रम में कब दाखिला लिया, पाठ्यक्रम नियमित था या नहीं, कितने समय तक कक्षाओं में उपस्थित रहना जरूरी था और इस दौरान स्कूल में उनकी उपस्थिति कैसे दर्ज हुई। नौकरी के रिकॉर्ड और डिग्री हासिल करने के वर्ष का भी मिलान किया जाएगा। यानी अब केवल शिक्षक की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण पर्याप्त नहीं माना जाएगा। दस्तावेजों और विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड के आधार पर पूरे मामले की जांच होगी।
नियम तोड़ने पर हो सकती है कड़ी कार्रवाई
विभागीय जांच में यदि यह साबित होता है कि किसी शिक्षक ने बिना जरूरी अनुमति नौकरी के दौरान नियमित पाठ्यक्रम किया है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। संभावित कार्रवाई में निलंबन, पदोन्नति पर रोक और वेतन वृद्धि रोकना शामिल है। कुछ मामलों में डिग्री की वैधता को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं, खासकर तब जब पाठ्यक्रम के लिए नियमित रूप से विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में उपस्थित रहना अनिवार्य था। हालांकि किसी डिग्री की वैधता पर अंतिम स्थिति संबंधित नियमों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही स्पष्ट होगी।
दूरस्थ शिक्षा को लेकर विभाग की अलग नीति
शिक्षा विभाग के अनुसार, शिक्षकों को उच्च शिक्षा हासिल करने से रोका नहीं गया है। इसके लिए नियमों के तहत पूर्व अनुमति लेने की व्यवस्था है। विभाग ऐसी पढ़ाई को प्राथमिकता देता है जिससे शिक्षक की नौकरी और विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो। दूरस्थ शिक्षा और ऑनलाइन माध्यम से संचालित पाठ्यक्रमों के जरिए शिक्षक अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ा सकते हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय और नालंदा खुला विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से पाठ्यक्रम करने के मामलों में नियमानुसार अनुमति दिए जाने की व्यवस्था रही है। इसका उद्देश्य यह है कि शिक्षक अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए विद्यालय की जिम्मेदारियों का भी ठीक से निर्वहन कर सकें।
मंत्री बोले- विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए
शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा है कि शिक्षकों को अपनी योग्यता बढ़ाने की छूट है, लेकिन इसका असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर नहीं पड़ना चाहिए। सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षा हासिल करने के इच्छुक शिक्षक नियमानुसार विभाग से अनुमति लेकर ही नियमित पाठ्यक्रम करें। वहीं शिक्षक संघ ने भी शिक्षकों के लिए उच्च शिक्षा के अवसर बनाए रखने की मांग की है। संघ के प्रदेश सचिव आनंद मिश्रा के अनुसार, शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता बढ़ना जरूरी है, लेकिन अनुमति लेने की प्रक्रिया को व्यावहारिक और आसान बनाया जाना चाहिए। उनका कहना है कि प्रक्रिया सरल होने से शिक्षक नियमों के दायरे में रहकर अपनी पढ़ाई जारी रख सकेंगे।
800 शिक्षकों की जांच से साफ होगी तस्वीर
फिलहाल करीब 800 शिक्षक शिक्षा विभाग की निगरानी में हैं। जांच आगे बढ़ने के साथ यह स्पष्ट होगा कि इनमें कितने शिक्षकों ने नियमों की अनदेखी की और कितने मामलों में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं। सरकार के लिए इस जांच का मुख्य उद्देश्य सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना और विद्यार्थियों की पढ़ाई को प्रभावित होने से बचाना है। यदि कोई शिक्षक उच्च शिक्षा हासिल करना चाहता है तो उसके लिए नियमों के तहत रास्ता खुला है, लेकिन बिना अनुमति नियमित पाठ्यक्रम और स्कूल की जिम्मेदारी के बीच तालमेल नहीं बैठाने वालों पर विभाग अब सख्ती के मूड में दिखाई दे रहा है।