ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच चीन की जमाखोरी से बढ़ी वैश्विक चिंता, भारत पर भी असर की आशंका
- चीन पर अनाज और खाद का विशाल भंडार जुटाने का आरोप, विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष ने दी चेतावनी
- खाद की कीमतों में भारी उछाल से भारत समेत कृषि प्रधान देशों पर बढ़ सकता है आर्थिक दबाव
नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और आपूर्ति व्यवस्था को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि, समुद्री व्यापार मार्गों पर संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आई रुकावटों ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच चीन को लेकर सामने आई एक नई रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल पैदा कर दी है। आरोप है कि चीन चुपचाप बड़ी मात्रा में अनाज और खाद का भंडारण कर रहा है, जिससे वैश्विक खाद्य और कृषि संकट गहरा सकता है। विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष डेविड मालपास ने एक अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्था से बातचीत में दावा किया है कि चीन इस समय दुनिया का सबसे बड़ा अनाज और खाद भंडार तैयार कर रहा है। उन्होंने कहा कि बीजिंग को तत्काल इस जमाखोरी पर रोक लगानी चाहिए ताकि वैश्विक आपूर्ति संकट को और गंभीर होने से बचाया जा सके। मालपास के अनुसार चीन केवल घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखकर भंडारण नहीं कर रहा, बल्कि वह लगातार अपने भंडार को और बढ़ा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि चीन इसी तरह अनाज और खाद जमा करता रहा, तो दुनिया के कई देशों में खाद्य और कृषि संकट गहरा सकता है। चीन ने मार्च की शुरुआत से ही खाद के निर्यात पर रोक लगा दी थी। चीन का कहना है कि उसने घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए यह कदम उठाया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे केवल घरेलू जरूरतें नहीं, बल्कि एक बड़ी रणनीतिक योजना भी हो सकती है। चीन के इस कदम का असर भारत समेत कई कृषि प्रधान देशों पर दिखाई देने लगा है। भारत अपनी खाद जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। विशेष रूप से डीएपी और यूरिया जैसी खादों के मामले में विदेशों से आयात महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ईरान युद्ध शुरू होने से पहले भारत लगभग 512 डॉलर प्रति टन की कीमत पर यूरिया खरीद रहा था, लेकिन अब इसकी कीमत बढ़कर लगभग 959 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है। यानी कुछ ही समय में खाद की कीमत लगभग दोगुनी हो चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और व्यापार आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां गतिविधियां बाधित होने से आयात-निर्यात पर गंभीर असर पड़ा है। चीन को आशंका है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है और आपूर्ति प्रभावित रहती है, तो उसके सामने खाद्य संकट की स्थिति पैदा हो सकती है। इसी वजह से वह पहले से ही बड़े पैमाने पर अनाज और खाद का भंडारण कर रहा है। कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि चीन इस भंडारण के जरिए वैश्विक राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। यदि दुनिया में खाद और अनाज की कमी बढ़ती है, तो चीन अपने विशाल भंडार का उपयोग दबाव बनाने और आर्थिक लाभ कमाने के लिए कर सकता है। भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंता का विषय बनती जा रही है। भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर आधारित है और खाद की बढ़ती कीमतें सीधे किसानों को प्रभावित करेंगी। यदि खाद महंगी होती है, तो खेती की लागत बढ़ेगी और इसका असर खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि खेती की लागत बढ़ने से अंततः खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि होगी। इससे आम लोगों पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। भारत पहले से ही महंगे कच्चे तेल की समस्या से जूझ रहा है और अब खाद की बढ़ती कीमतें आर्थिक दबाव को और बढ़ा सकती हैं। आर्थिक जानकारों के अनुसार सरकार को इस स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक आयात स्रोतों की तलाश, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और रणनीतिक भंडारण नीति को मजबूत करने की आवश्यकता होगी। साथ ही किसानों को राहत देने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे। फिलहाल दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान युद्ध और उसके वैश्विक प्रभावों पर टिकी हुई है। चीन की कथित जमाखोरी ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय हालात और देशों की रणनीतियां वैश्विक अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा की दिशा तय करेंगी।


