पटना में स्वास्थ्य केंद्र पर नवजात बच्चा बदलने का आरोप, परिजनों ने जमकर किया हंगामा, पुलिस ने शांत कराया मामला
पटना। जिले के बाढ़ अनुमंडल अंतर्गत पंडारक थाना क्षेत्र स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में उस समय अफरातफरी मच गई, जब नवजात शिशु बदलने का आरोप लगाते हुए परिजनों ने जमकर हंगामा किया। मामला इतना बढ़ गया कि अस्पताल परिसर में तनाव का माहौल बन गया और स्वास्थ्यकर्मियों को काम करने में दिक्कत होने लगी। सूचना मिलने के बाद पंडारक थाना पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को संभालते हुए मामले की जांच शुरू की।
एक साथ हुई दो महिलाओं की डिलीवरी
घटना के संबंध में पुलिस और अस्पताल प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दो महिलाओं की डिलीवरी लगभग एक ही समय पर हुई थी। संजना नामक महिला ने एक बच्ची को जन्म दिया था, जबकि अर्चना नामक महिला ने एक बेटे को जन्म दिया। डिलीवरी के बाद दोनों नवजात शिशुओं को अस्पताल के वार्मर में रखा गया था, ताकि उन्हें आवश्यक चिकित्सकीय देखभाल मिल सके। इसी दौरान गलतफहमी की स्थिति उत्पन्न हो गई।
परिजनों का आरोप और बढ़ता विवाद
संजना के परिजनों ने आरोप लगाया कि उनका बेटा पैदा हुआ था, लेकिन अस्पताल कर्मियों ने बच्चा बदल दिया है। इसी संदेह के चलते वे अर्चना के नवजात बेटे को गोद में उठाकर अपना बच्चा होने का दावा करने लगे। इस बात पर दोनों परिवारों के बीच कहासुनी शुरू हो गई, जो देखते ही देखते हंगामे में बदल गई। अस्पताल परिसर में मौजूद अन्य मरीजों और उनके परिजनों में भी भय और असमंजस की स्थिति बन गई।
अस्पताल प्रशासन की सफाई
हंगामे के दौरान अस्पताल प्रशासन ने परिजनों को समझाने का प्रयास किया। स्वास्थ्यकर्मियों का कहना था कि डिलीवरी के समय सभी आवश्यक रिकॉर्ड बनाए गए थे और किसी तरह की लापरवाही नहीं हुई है। दोनों महिलाओं और उनके नवजातों की जानकारी अस्पताल रजिस्टर में दर्ज थी। इसके बावजूद परिजन आरोप मानने को तैयार नहीं थे और मामला पुलिस तक पहुंच गया।
पुलिस की एंट्री और जांच
सूचना मिलते ही पंडारक थाना पुलिस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंची। थानाध्यक्ष नवनीत कुमार के नेतृत्व में पुलिस टीम ने सबसे पहले दोनों पक्षों को शांत कराया। इसके बाद पुलिस ने पूरे मामले की गहनता से जांच शुरू की। अस्पताल के रजिस्टर, डिलीवरी रिकॉर्ड और वार्मर में रखे जाने की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी को खंगाला गया। पुलिस ने यह भी देखा कि किस समय किस महिला की डिलीवरी हुई और किस नवजात को किसके नाम से दर्ज किया गया।
दो घंटे तक चली जांच
करीब दो घंटे तक पुलिस और अस्पताल प्रशासन ने मिलकर मामले की जांच की। इस दौरान दोनों परिवारों से अलग-अलग पूछताछ की गई और घटनाक्रम को समझने की कोशिश की गई। पुलिस के अनुसार, जांच में यह स्पष्ट हुआ कि अस्पताल के रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ी नहीं है। संजना ने बच्ची को ही जन्म दिया था और अर्चना ने बेटे को। किसी भी स्तर पर नवजात बदलने का प्रमाण नहीं मिला।
डीएनए टेस्ट का विकल्प
अस्पताल प्रभारी ने बताया कि यदि दोनों परिवार पुलिस की जांच से संतुष्ट नहीं होते, तो अंतिम विकल्प के तौर पर दोनों नवजातों का डीएनए टेस्ट कराया जा सकता था। डीएनए जांच से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता कि बच्चा किस माता-पिता का है। हालांकि, पुलिस द्वारा समझाने और रिकॉर्ड दिखाने के बाद दोनों परिवार जांच के निष्कर्ष से सहमत हो गए, जिससे डीएनए टेस्ट की आवश्यकता नहीं पड़ी।
मामला हुआ शांत
पुलिस की समझाइश और तथ्यों के सामने आने के बाद दोनों परिवारों ने हंगामा समाप्त कर दिया। जांच पूरी होने के बाद संजना को उसकी नवजात बच्ची और अर्चना को उसका नवजात बेटा सौंप दिया गया। इसके बाद दोनों परिवार अपने-अपने बच्चों के साथ अस्पताल से घर लौट गए। पुलिस ने भी राहत की सांस ली, क्योंकि मामला किसी बड़े विवाद या हिंसा में तब्दील होने से पहले ही शांत हो गया।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल
हालांकि मामला सुलझ गया, लेकिन इस घटना ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में व्यवस्था और भरोसे को लेकर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में पहले से ही लोगों में सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को लेकर आशंकाएं रहती हैं। ऐसे में नवजात बदलने जैसे आरोप स्थिति को और संवेदनशील बना देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि डिलीवरी के बाद नवजातों की पहचान से जुड़ी प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने की जरूरत है।
प्रशासन की अपील
पुलिस और अस्पताल प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि किसी भी तरह की शंका होने पर सीधे हंगामा करने के बजाय प्रशासन और स्वास्थ्यकर्मियों से बातचीत करें। बिना जांच-पड़ताल के आरोप लगाने से न केवल अस्पताल का माहौल खराब होता है, बल्कि अन्य मरीजों को भी परेशानी होती है। प्रशासन का कहना है कि हर मामले की निष्पक्ष जांच की जाती है और जरूरत पड़ने पर वैज्ञानिक तरीकों का सहारा भी लिया जाता है। पंडारक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में नवजात शिशु बदलने के आरोप ने कुछ समय के लिए तनाव की स्थिति पैदा कर दी थी, लेकिन पुलिस और अस्पताल प्रशासन की सूझबूझ से मामला शांतिपूर्ण तरीके से सुलझ गया। यह घटना एक ओर जहां प्रशासनिक तत्परता का उदाहरण है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य संस्थानों में भरोसा बनाए रखने की चुनौती को भी उजागर करती है। भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए जरूरी है कि अस्पतालों में प्रक्रियाओं को और सख्ती से लागू किया जाए और परिजनों को भी संयम और समझदारी से काम लेने की सलाह दी जाए।


