सृजन घोटाला:- रजनी प्रिया की गिरफ्तारी के बाद भी अधूरा इंसाफ, आखिर कहां दफन हैं राजनीतिक सरपरस्तों के राज?
>>आठ साल से अधिक की जांच, 25 एफआईआर और 22 आरोपपत्रों के बावजूद कई बड़े सवाल कायम; सरकारी खजाने से निकली रकम की वापसी और राजनीतिक-अफसरशाही की कथित भूमिका पर अब भी निगाहें

पटना।(अमृतवर्षा ब्यूरो)।बिहार के बहुचर्चित सृजन घोटाले की कहानी केवल सरकारी खजाने से कथित तौर पर हजारों करोड़ रुपये की हेराफेरी तक सीमित नहीं है। यह उस प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है, जिसमें सरकारी धन के बैंक खातों से बाहर जाने, वर्षों तक वित्तीय अनियमितताओं के जारी रहने और एक निजी संस्था के खातों के जरिए सरकारी रकम के कथित इस्तेमाल का मामला सामने आया। इस प्रकरण में मुख्य आरोपितों में शामिल रजनी प्रिया की गिरफ्तारी के बाद भी घोटाले के कई अहम पहलू पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सके हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सृजन घोटाले की जांच केवल धन की हेराफेरी में शामिल लोगों तक सीमित रह गई, या उस कथित संरक्षण तंत्र की भी पूरी पड़ताल हुई, जिसके बिना इतने बड़े पैमाने पर सरकारी धन का दुरुपयोग लंबे समय तक संभव नहीं माना जा सकता?
यह सवाल राजनीतिक आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि जांच के दायरे, सामने आए तथ्यों और अब तक अनुत्तरित सवालों के आधार पर उठता है।
2003 से 2017 तक कैसे चलता रहा कथित खेल?
भागलपुर स्थित सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड इस पूरे प्रकरण के केंद्र में रही। जांच एजेंसियों के आरोपों के मुताबिक, सरकारी विभागों की रकम बैंक खातों के माध्यम से संस्था से जुड़े खातों में स्थानांतरित की जाती थी। इस धन का कथित तौर पर दूसरे कार्यों में इस्तेमाल और निवेश किया जाता था। सरकारी खाते में राशि की उपलब्धता और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर लंबे समय तक सामने नहीं आ सका।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, भागलपुर और बांका के सरकारी खजानों से धन के कथित गबन का सिलसिला 2003 से अगस्त 2017 तक चला। घोटाले का खुलासा तब हुआ, जब सरकारी खाते से संबंधित 17.70 करोड़ रुपये का चेक बाउंस हुआ और वित्तीय गड़बड़ियों की जांच शुरू हुई। शुरुआती जांच में कई विभागों के खातों में अनियमितताओं के संकेत मिले।यही वह मोड़ था, जिसने बिहार के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी।
7 अगस्त 2017 को पहली प्राथमिकी दर्ज होने के बाद मामला लगातार फैलता गया। मुख्यमंत्री के निर्देश पर सीबीआई जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी और केंद्रीय एजेंसी ने कई मामले दर्ज कर जांच अपने हाथ में ली।लेकिन घोटाले का खुलासा होना और पूरे नेटवर्क को बेनकाब करना दो अलग-अलग बातें हैं।
रजनी प्रिया गिरफ्तार, लेकिन अमित कुमार का रहस्य बरकरार
सृजन संस्था की संस्थापक मनोरमा देवी के निधन के बाद उनके बेटे अमित कुमार और बहू रजनी प्रिया की भूमिका जांच के केंद्र में आई। दोनों पर गंभीर आरोप लगे और दोनों लंबे समय तक फरार रहे।
अगस्त 2023 में सीबीआई ने रजनी प्रिया को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के साहिबाबाद इलाके से गिरफ्तार किया। यह जांच एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण सफलता थी। लेकिन गिरफ्तारी के बाद एक और बड़ा सवाल सामने आया—अमित कुमार कहां हैं?
रजनी प्रिया ने जांच एजेंसी को बताया था कि उनके पति अमित कुमार की मृत्यु हो चुकी है। सीबीआई ने इस दावे की पुष्टि के लिए साक्ष्यों की जांच की। सीबीआई सूत्रों के के अनुसार, अमित कुमार की स्थिति पर सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल नहीं की थी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि एजेंसी को उनकी मृत्यु से संबंधित दावे की पुष्टि करने वाले दस्तावेजों को लेकर संदेह था।
अर्थात, अमित कुमार की मृत्यु की बात को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। उनकी वास्तविक स्थिति की आधिकारिक पुष्टि और मामले में जांच की प्रगति आज भी महत्वपूर्ण सवाल हैं।एक प्रमुख आरोपित की स्थिति ही स्पष्ट नहीं हो, तो पूरे मामले की अंतिम तस्वीर पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
25 एफआईआर, 22 आरोपपत्र, फिर भी इंसाफ का इंतजार
सृजन घोटाले की जांच में सीबीआई ने कई प्राथमिकी दर्ज कीं और विभिन्न आरोपितों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किए। अब तक की गई कार्रवाइयों के प्रतिवेदन के मुताबिक 25 एफआईआर और 22 आरोपपत्रों का उल्लेख है।प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरोपपत्रों में 87 लोगों को कथित संलिप्तता के आधार पर शामिल किया गया था। यह संख्या जांच के व्यापक दायरे को दर्शाती है, लेकिन आरोपपत्र में नाम होना और अदालत में दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं।
इस मामले में असली कसौटी यह है कि अदालत में साक्ष्य कितनी मजबूती से प्रस्तुत किए जाते हैं, मुकदमों का निपटारा कब होता है और सरकारी धन की वसूली किस हद तक संभव हो पाती है।
जांच की लंबी अवधि अपने आप में किसी एजेंसी की विफलता का अंतिम प्रमाण नहीं है। इतने बड़े वित्तीय प्रकरण में कई मुकदमों, दस्तावेजों और आरोपितों की भूमिका की जांच जटिल हो सकती है। लेकिन वर्षों बाद भी जब आम जनता को निर्णायक न्याय और धन की वापसी का स्पष्ट परिणाम नहीं दिखता, तब जवाबदेही का सवाल और तीखा हो जाता है।
राजनीतिक सरपरस्ती का सवाल: जांच की सबसे अहम कड़ी?
सृजन घोटाले पर चर्चा होते ही राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण की संभावित भूमिका का प्रश्न उठता है। आखिर सरकारी धन के संचालन, बैंक खातों के प्रबंधन और वित्तीय रिकॉर्ड की निगरानी की जिम्मेदारी अलग-अलग संस्थाओं के पास थी। यदि अनियमितताएं लंबे समय तक जारी रहीं, तो उन संस्थागत सुरक्षा व्यवस्थाओं ने समय रहते प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की?
इस सवाल के कम-से-कम चार पहलुओं की स्पष्टता जरूरी है:
– प्रशासनिक जवाबदेही: संबंधित विभागों के खातों, भुगतान प्रक्रियाओं और ऑडिट में सामने आई गड़बड़ियों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
– बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका: सरकारी धन के कथित हस्तांतरण में किन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका जांच में स्थापित हुई तथा उनकी जिम्मेदारी पर क्या निष्कर्ष निकले?
– राजनीतिक संपर्कों की जांच: क्या जांच एजेंसियों ने उन संभावित संपर्कों और लाभार्थियों की भी पड़ताल की, जिनके संबंध में ठोस वित्तीय या दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध थे?
– धन की अंतिम मंजिल: कथित रूप से गबन की गई रकम कहां निवेश हुई, किन संपत्तियों में बदली और कितनी राशि की वास्तविक वसूली हो सकी?
यही सृजन घोटाले की वह परत है, जिस पर पारदर्शी और तथ्याधारित जवाबदेही की मांग सबसे अधिक जरूरी है।
अब जवाबदेही से नहीं बच सकते अहम सवाल
सृजन घोटाले की जांच में गिरफ्तारियां हुईं, आरोपपत्र दाखिल हुए और संपत्तियों पर कार्रवाई भी की गई। फिर भी मुकदमों के अंतिम परिणाम, अमित कुमार की स्थिति, धन की वास्तविक वसूली और कथित राजनीतिक-अफसरशाही संपर्कों को लेकर स्पष्ट तस्वीर सामने आना जरूरी है।
यह मामला केवल कुछ आरोपितों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकारी धन की सुरक्षा, बैंकिंग व्यवस्था की जवाबदेही और प्रशासनिक निगरानी की विफलताओं से जुड़े सवालों का उत्तर भी सामने आना चाहिए।
आखिरकार, सृजन घोटाले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं कि पैसा किसने निकाला; सवाल यह भी है कि सरकारी व्यवस्था में ऐसी सेंध लगने कैसे दी गई, धन का अंतिम लाभ किसे मिला और जनता के पैसे की भरपाई कब होगी?
जब तक जांच के निष्कर्ष और सरकारी धन की वापसी की स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आती, तब तक सृजन घोटाले की कहानी अधूरी ही मानी जाएगी।

