कल विजय सिन्हा से भिड़े थे अशोक चौधरी,आज ग्लोबल टेंडर रद्द तो सन्नाटा क्यों?
>>नीतीश राज में जिस टेंडर नीति पर एनडीए के भीतर छिड़ी थी बहस, सम्राट सरकार में उसी पर यू-टर्न; क्या भाजपा के फैसलों के सामने जदयू की आवाज कमजोर पड़ रही है?

पटना।(अमृतवर्षा ब्यूरो)।बिहार की राजनीति में सत्ता की असली ताकत का पता केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी से नहीं चलता। असली तस्वीर तब सामने आती है, जब सरकार के भीतर दो सहयोगी दलों की राय टकराती है और किसी एक का फैसला अंतिम मान लिया जाता है। ग्रामीण कार्य विभाग की ग्लोबल टेंडर पैकेज नीति को लेकर उठा विवाद अब इसी कसौटी पर देखा जा रहा है। एक तरफ नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में इस नीति का बचाव करते हुए विभागीय मंत्री डॉ. अशोक चौधरी ने भाजपा के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा के विरोध का जवाब दिया था। दूसरी तरफ सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट ने ग्रामीण सड़कों और पुलों के निर्माण में ग्लोबल टेंडर की व्यवस्था हटाने का फैसला किया। इस बार अशोक चौधरी की ओर से वैसा मुखर विरोध सार्वजनिक चर्चा में सामने नहीं आया।
यही वह राजनीतिक विरोधाभास है, जिसने सवाल खड़े किए हैं—क्या सरकार बदलने के साथ नीति पर राय भी बदल गई? क्या पहले जिस व्यवस्था को सही ठहराया जा रहा था, वह अब गलत हो गई? या फिर सत्ता के नए समीकरणों में जदयू के वरिष्ठ नेताओं की भूमिका पहले जैसी नहीं रह गई है?
इन सवालों का उत्तर राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि फैसलों, उनके औचित्य और संबंधित नेताओं की सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं से तलाशना होगा।
जब विजय सिन्हा और अशोक चौधरी आमने-सामने थे
जुलाई 2025 में बिहार विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान एनडीए विधायक दल की बैठक में ग्रामीण कार्य विभाग की टेंडर नीति को लेकर विजय कुमार सिन्हा और डॉ. अशोक चौधरी के बीच तीखी बहस की खबरें सामने आई थीं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, विवाद बड़े पैकेजों में टेंडर जारी करने की व्यवस्था को लेकर था। सिन्हा ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई, जबकि अशोक चौधरी ने विभाग की प्रक्रिया का बचाव किया। उस समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी बैठक में मौजूद थे।
विवाद के बाद 25 जुलाई 2025 को अशोक चौधरी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि ग्रामीण सड़कों के लिए ग्लोबल नहीं, बल्कि नेशनल बिडिंग की प्रक्रिया अपनाई गई है। उन्होंने विभाग की ओर से 1,038 पैकेजों के टेंडर और सरकार को 816 करोड़ रुपये की बचत होने का दावा भी किया था। उनका तर्क था कि पैकेज छोटे रखे गए हैं, ताकि स्थानीय संवेदकों को भी काम मिलने का अवसर मिले।
यानी उस समय मंत्री का पक्ष स्पष्ट था—विभाग की टेंडर व्यवस्था को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और अपनाई गई प्रक्रिया से सरकार को आर्थिक लाभ हुआ है।
लेकिन राजनीति में असली परीक्षा तब होती है, जब वही नीति आगे चलकर बदल दी जाए। क्या किसी व्यवस्था का बचाव करने वाले मंत्री को बाद में उसके उलट निर्णय पर सवाल नहीं उठाना चाहिए? या कैबिनेट के सामूहिक फैसले के सामने पुरानी दलीलें अपने आप अप्रासंगिक हो जाती हैं?
सम्राट सरकार का फैसला और नीति पर यू-टर्न
29 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में ग्रामीण सड़कों और पुलों के निर्माण से ग्लोबल टेंडर की व्यवस्था हटाने का फैसला लिया गया। 30 अप्रैल की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने पैकेज के रूप में टेंडर करने के बजाय प्रत्येक परियोजना के लिए अलग-अलग टेंडर की व्यवस्था अपनाने का निर्णय किया। ग्रामीण कार्य विभाग के सचिव दिवेश सेहरा ने भी इस बदलाव की जानकारी दी थी। रिपोर्ट में इसे विधायकों की मांग के बाद लिया गया फैसला बताया गया।
यहां दो बातें अलग-अलग समझना जरूरी है। पहली, ग्लोबल टेंडर की नीति हटाने का कैबिनेट फैसला। दूसरी, पहले से चल रही या पूरी हो चुकी टेंडर प्रक्रियाओं को रद्द करने की प्रशासनिक कार्रवाई। दोनों संबंधित हैं, लेकिन एक ही बात नहीं हैं।
28 जुलाई 2026 के पटना हाईकोर्ट के एक आदेश में ग्रामीण कार्य विभाग के 30 अप्रैल 2026 के आदेश का उल्लेख है, जिसके तहत संबंधित योजना के लंबित और निष्कर्ष तक पहुंच चुके टेंडर प्रक्रियाओं को भी रद्द किया गया था। अदालत में राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि नई नीति के अनुरूप पुरानी प्रक्रियाओं को रद्द करना प्रशासनिक निर्णय था। इस मामले में अदालत ने संबंधित निविदा प्रक्रिया रद्द करने के फैसले में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया। यह आदेश एक विशेष मामले और संबंधित योजना की पृष्ठभूमि में था; इसे हर परियोजना या हर प्रकार के टेंडर पर स्वतः लागू मानना सही नहीं होगा।
अब सवाल यह है कि जिस टेंडर व्यवस्था का बचाव अशोक चौधरी ने 2025 में किया था, उसे बदलने के फैसले पर उनकी मौजूदा स्थिति क्या है? क्या उन्होंने कैबिनेट के फैसले को नीतिगत सुधार मान लिया? क्या उन्होंने विभागीय अनुभव के आधार पर कोई असहमति दर्ज की? या उन्हें लगा कि नई परिस्थितियों में अलग व्यवस्था ज्यादा उपयुक्त है?
भाजपा का फैसला, जदयू की सहमति या मजबूरी?
सम्राट सरकार में भाजपा और जदयू दोनों सहयोगी हैं। ऐसे गठबंधन में महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों पर मतभेद होना असामान्य नहीं है। सवाल यह है कि मतभेद सामने आने पर सहयोगी दलों की राय को कितनी जगह मिलती है और कैबिनेट में निर्णय किस आधार पर लिया जाता है।
ग्लोबल टेंडर के मामले में भाजपा के विजय सिन्हा ने पहले सवाल उठाए थे। तब जदयू के मंत्री अशोक चौधरी ने जवाब दिया था। बाद में सम्राट चौधरी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने टेंडर व्यवस्था बदल दी। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नई सरकार में भाजपा की प्राथमिकताएं नीतिगत फैसलों पर अधिक प्रभाव डाल रही हैं।
लेकिन केवल इस एक प्रकरण से यह निष्कर्ष निकालना कि भाजपा मनमाने ढंग से सरकार चला रही है या जदयू के मंत्री डर के कारण बोल नहीं पा रहे हैं, तथ्यों से आगे बढ़ना होगा। इसकी पुष्टि के लिए कैबिनेट की कार्यवाही, निर्णय प्रक्रिया, जदयू नेताओं के बयान और दूसरे विभागों में हुए नीतिगत बदलावों का भी अध्ययन करना होगा।
फिर भी जदयू के लिए यह सवाल असहज जरूर है। यदि पार्टी के वरिष्ठ मंत्री किसी नीति का सार्वजनिक बचाव करते हैं और बाद में वही व्यवस्था बदल दी जाती है, तो उन्हें जनता को बताना चाहिए कि उनका पहले का आकलन गलत था, परिस्थितियां बदल गईं या नई व्यवस्था के पक्ष में कोई बेहतर तर्क सामने आया।
नीति बदली है तो उसका कारण भी स्पष्ट होना चाहिए। केवल सत्ता के साथ खड़े रहने से राजनीतिक जवाबदेही पूरी नहीं होती।
छोटे ठेकेदारों का हित या व्यवस्था में सुधार?
सरकार की ओर से टेंडर व्यवस्था बदलने के पीछे स्थानीय संवेदकों को अवसर देने और परियोजनाओं को अलग-अलग टेंडर में बांटने का तर्क महत्वपूर्ण हो सकता है। बड़े पैकेजों में छोटे ठेकेदारों की भागीदारी सीमित होने की आशंका रहती है। दूसरी ओर, पैकेज आधारित व्यवस्था से समन्वय, लागत नियंत्रण और काम की निगरानी में कुछ लाभ भी हो सकते हैं। किस मॉडल से बेहतर परिणाम मिलेंगे, इसका फैसला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा, लागत, गुणवत्ता, समय पर काम पूरा होने और स्थानीय ठेकेदारों की भागीदारी जैसे आंकड़ों से होना चाहिए।
अशोक चौधरी ने 2025 में पैकेज व्यवस्था के पक्ष में बचत और स्थानीय संवेदकों की भागीदारी का दावा किया था। सम्राट सरकार ने 2026 में व्यवस्था बदल दी। अब सरकार को बताना चाहिए कि नए मॉडल से क्या लाभ अपेक्षित हैं और पुराने मॉडल की किन कमियों के कारण बदलाव जरूरी समझा गया। क्या नई व्यवस्था से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी? क्या परियोजनाएं समय पर पूरी होंगी? क्या लागत कम होगी? और क्या पहले से निविदा प्रक्रिया में शामिल ठेकेदारों के हितों का निष्पक्ष तरीके से ध्यान रखा गया?
इन सवालों का जवाब जनता के हित में जरूरी है, क्योंकि ग्रामीण सड़कें केवल ठेकेदारों और मंत्रियों का विषय नहीं हैं। उनका सीधा संबंध गांवों की आवाजाही, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से है।
मंत्री की चुप्पी पर सवाल, लेकिन फैसला जनता तथ्यों से करे
राजनीतिक व्यंग्य के लिए इस प्रकरण में पर्याप्त विरोधाभास है। कल तक जिस व्यवस्था के पक्ष में तर्क दिए जा रहे थे, आज उसी व्यवस्था को बदलने का निर्णय हो चुका है। पहले बहस सार्वजनिक थी, अब प्रतिक्रिया को लेकर सवाल हैं। सत्ता के गलियारों में यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या यह नीतिगत पुनर्विचार है या गठबंधन के भीतर बदलते शक्ति-संतुलन की तस्वीर।
लेकिन चुप्पी का अर्थ हमेशा डर नहीं होता और कैबिनेट के फैसले से असहमति का अर्थ हमेशा सार्वजनिक विरोध भी नहीं होता। मंत्रिमंडलीय व्यवस्था में सामूहिक निर्णय की अपनी भूमिका है। असली प्रश्न यह है कि क्या निर्णय पारदर्शी प्रक्रिया से लिया गया, क्या उसका पर्याप्त औचित्य बताया गया और क्या संबंधित मंत्री अपनी पूर्ववर्ती दलीलों के बारे में जवाब देने को तैयार हैं।
अशोक चौधरी के लिए भी यह अवसर है कि वे स्पष्ट करें कि 2025 में विभाग की टेंडर नीति के पक्ष में दिए गए तर्कों और 2026 के बदलाव के बीच क्या अंतर है। भाजपा और जदयू—दोनों को बताना चाहिए कि यह फैसला किसी राजनीतिक वर्चस्व का परिणाम नहीं, बल्कि किस ठोस प्रशासनिक और आर्थिक मूल्यांकन पर आधारित है।
बड़ा सवाल: सत्ता में साझेदारी बराबरी की है या केवल संख्या की?
ग्लोबल टेंडर विवाद अब सिर्फ ग्रामीण कार्य विभाग की तकनीकी नीति का मामला नहीं रह गया है। यह सहयोगी दलों के बीच संवाद, मंत्री की जवाबदेही और सरकार के फैसलों की पारदर्शिता से जुड़ा सवाल बन गया है।
क्या सम्राट सरकार में भाजपा के विचारों को अधिक प्राथमिकता मिल रही है? क्या जदयू के वरिष्ठ मंत्री पहले की तरह नीतिगत असहमति दर्ज करा रहे हैं? या फिर कैबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी के नाम पर मतभेद सार्वजनिक बहस से बाहर रह जाते हैं? इन सवालों का जवाब एक टेंडर विवाद से पूरी तरह नहीं मिलेगा, लेकिन यह प्रकरण उनकी पड़ताल का एक महत्वपूर्ण आधार जरूर देता है।
नीतीश राज में जिस नीति पर मंत्री और उपमुख्यमंत्री आमने-सामने आ गए थे, सम्राट राज में उसी व्यवस्था के बदलने पर क्या मंत्री की पुरानी दलीलें भी बदल गईं? बिहार की राजनीति में यह सवाल अब केवल अशोक चौधरी का नहीं, बल्कि भाजपा-जदयू गठबंधन की कार्यशैली और जवाबदेही का भी है।

