बिहार में पीएचडी प्रवेश नियमों में बड़ा बदलाव, अब शोध सहित चार वर्षीय स्नातक के बाद मिलेगा सीधा प्रवेश

  • नई विनियमावली लागू, 2017 की पुरानी व्यवस्था समाप्त; राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर होगा चयन
  • शोध की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए शोध पत्र, अकादमिक सम्मेलन और शिक्षण प्रशिक्षण किए गए अनिवार्य

पटना। बिहार सरकार ने राज्य में उच्च शिक्षा और शोध व्यवस्था को नई दिशा देने के उद्देश्य से पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में व्यापक बदलाव किए हैं। राज्यपाल एवं कुलाधिपति सचिवालय की मंजूरी के बाद बिहार राज्य विश्वविद्यालय पीएचडी अध्यादेश एवं विनियम, 2026 लागू कर दिया गया है। इसके साथ ही वर्ष 2017 से लागू पुरानी पीएचडी नियमावली समाप्त हो गई है। नई व्यवस्था 4 जुलाई 2026 से प्रभावी मानी जाएगी और राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में अब इसी विनियमावली के अनुसार पीएचडी में प्रवेश दिया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे शोध की गुणवत्ता में सुधार होगा तथा प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा और अनुसंधान के बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे।
चार वर्षीय शोध सहित स्नातक के बाद सीधे पीएचडी का अवसर
नई व्यवस्था के तहत अब चार वर्षीय शोध सहित स्नातक (ऑनर्स) पाठ्यक्रम पूरा करने वाले विद्यार्थी बिना स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त किए सीधे पीएचडी में प्रवेश के पात्र होंगे। हालांकि इसके लिए निर्धारित शैक्षणिक मानदंडों को पूरा करना आवश्यक होगा। विनियम के अनुसार यदि किसी विद्यार्थी ने चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम के पहले छह सत्रों में 7.5 या उससे अधिक संचयी ग्रेड प्राप्तांक हासिल किया है, तो उसे चौथे वर्ष में शोध का विकल्प मिलेगा। इस अवधि में वह पीएचडी के लिए आवश्यक पाठ्यक्रम भी पूरा कर सकेगा। इसके बाद ऐसे विद्यार्थियों को अलग से एक वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम करने की आवश्यकता नहीं होगी और वे सीधे पीएचडी में प्रवेश ले सकेंगे। वहीं जिन विद्यार्थियों का संचयी ग्रेड प्राप्तांक 7.5 से कम होगा, उन्हें केवल स्नातक (ऑनर्स) की उपाधि प्रदान की जाएगी। ऐसे अभ्यर्थियों को आगे पीएचडी के लिए निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
तीन वर्षीय स्नातक करने वालों के लिए अलग व्यवस्था
नई नियमावली में तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करने वाले विद्यार्थियों के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था की गई है। ऐसे अभ्यर्थियों को पहले दो वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पूरा करना होगा अथवा चार वर्षीय शोध सहित स्नातक के बाद एक वर्षीय स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करनी होगी। सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक अनिवार्य रखे गए हैं। वहीं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अन्य आरक्षित वर्गों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के अनुसार निर्धारित छूट प्रदान की जाएगी।
राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा से होगा प्रवेश
नई व्यवस्था के अनुसार अब राज्य के विश्वविद्यालयों में पीएचडी में प्रवेश केवल राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग-वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद संयुक्त राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा अथवा अभियांत्रिकी स्नातक अभिक्षमता परीक्षा उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को ही मिलेगा। चयन प्रक्रिया में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा या अभियांत्रिकी स्नातक अभिक्षमता परीक्षा के अंकों को 80 प्रतिशत महत्व दिया जाएगा, जबकि शेष 20 प्रतिशत अंक साक्षात्कार के आधार पर निर्धारित होंगे। इससे प्रवेश प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और गुणवत्ता आधारित बनाने का प्रयास किया गया है।
शोध अवधि और विशेष सुविधाएं
नई विनियमावली के अनुसार पीएचडी की न्यूनतम अवधि तीन वर्ष और अधिकतम अवधि छह वर्ष निर्धारित की गई है। विशेष परिस्थितियों में शोधार्थियों को दो वर्ष का अतिरिक्त समय भी दिया जा सकेगा महिला शोधार्थियों तथा 40 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांगता वाले अभ्यर्थियों को भी दो वर्ष की अतिरिक्त विशेष छूट प्रदान की जाएगी, ताकि वे बिना अनावश्यक दबाव के अपना शोध कार्य पूरा कर सकें।
शोध पत्र और सम्मेलन हुए अनिवार्य
नई व्यवस्था में शोध की गुणवत्ता पर विशेष बल दिया गया है। अब पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने से पहले प्रत्येक शोधार्थी को कम से कम एक शोध पत्र किसी मान्यता प्राप्त शोध पत्रिका में प्रकाशित कराना अनिवार्य होगा। इसके अलावा किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन में अपने शोध कार्य का प्रस्तुतीकरण भी करना होगा। शोध प्रबंध में यदि 10 प्रतिशत से अधिक साहित्यिक समानता पाई जाती है तो उसे संशोधन के लिए वापस भेज दिया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य मौलिक अनुसंधान को बढ़ावा देना और शोध कार्य की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है।
शोध के साथ शिक्षण प्रशिक्षण भी जरूरी
नई नियमावली के अनुसार शोधार्थियों को केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं रखा जाएगा। उन्हें प्रत्येक सप्ताह चार से छह घंटे तक शिक्षण, प्रयोगशाला कार्य, मार्गदर्शन कक्षाओं अथवा शोध सहायक के रूप में कार्य करना होगा। इससे उन्हें अध्यापन और अनुसंधान दोनों का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होगा।
शोध निर्देशन को लेकर भी नया प्रावधान
नियमावली में शोध निर्देशन के संबंध में भी महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में तीन वर्ष से कम समय शेष होगा, वे नए शोधार्थियों का पंजीकरण नहीं कर सकेंगे। हालांकि पहले से उनके निर्देशन में कार्य कर रहे शोधार्थियों का मार्गदर्शन वे सेवानिवृत्ति तक करते रहेंगे।
छह माह में पूरी होगी मूल्यांकन प्रक्रिया
नई व्यवस्था के अनुसार शोध प्रबंध का मूल्यांकन दो बाह्य परीक्षकों और शोध निर्देशक द्वारा किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर मौखिक परीक्षा ऑनलाइन माध्यम से भी आयोजित की जा सकेगी। विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया है कि पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया छह माह के भीतर पूरी की जाए, ताकि शोधार्थियों को अनावश्यक प्रतीक्षा न करनी पड़े। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के वर्ष 2022 के मानकों के अनुरूप तैयार की गई इस नई विनियमावली से बिहार में शोध और उच्च शिक्षा व्यवस्था को अधिक आधुनिक, पारदर्शी तथा गुणवत्ता आधारित बनाने की उम्मीद जताई जा रही है। सरकार का मानना है कि इन सुधारों से राज्य के विश्वविद्यालयों में अनुसंधान संस्कृति को नई गति मिलेगी और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर के अनुरूप अवसर प्राप्त होंगे।

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