क्या एक माह की दूधमुंही बच्ची को मिलेगा इंसाफ़???

  • सरकारी उपेक्षा, दलालों का जाल और प्राइवेट नर्सिंग होम की लापरवाही ने छीन ली मां की जिंदगी
  • जन्म के बाद किलकारी गूंजी, फिर मातम में बदल गया घर का आंगन
  • गोपालपुर थाना पर कार्रवाई में सुस्ती का आरोप, परिजनों को अब तक नहीं मिली प्राथमिकी और पोस्टमार्टम रिपोर्ट

फुलवारीशरीफ, अजीत। संपतचक प्रखंड के अल्लाबकसपुर मुशहरी गांव की एक दर्दनाक घटना ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था, निजी अस्पतालों की मनमानी और प्रशासनिक संवेदनहीनता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक माह पहले जिस घर में नवजात बच्ची की किलकारी गूंजी थी, आज उसी घर में हर दिन एक ही सवाल गूंज रहा है — “क्या इस बच्ची को उसकी मां के लिए इंसाफ़ मिलेगा.” मृतका मुन्नी देवी, पति जीतू मांझी, को बीते 15 अप्रैल 2026 की रात प्रसव पीड़ा होने पर परिजन संपतचक स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे थे। परिजनों के अनुसार रात करीब दो बजे भर्ती करने के बाद डॉक्टरों ने सुबह लगभग तीन बजे सामान्य प्रसव कराया और बच्ची ने जन्म लिया। परिवार ने सोचा था कि घर में खुशियां आई हैं, लेकिन कुछ ही घंटों में यह खुशी मातम में बदल गई। आरोप है कि प्रसव के बाद मुन्नी देवी की हालत बिगड़ने लगी और अत्यधिक रक्तस्राव होने के बावजूद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में समुचित इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। परिजनों का कहना है कि अस्पताल ने मरीज को नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। इसी बीच दलालों के माध्यम से मरीज को संपतचक के एक निजी नर्सिंग होम “सेवा सदन” ले जाया गया, जहां इलाज के नाम पर पैसे की लूट और लापरवाही का खेल शुरू हो गया। परिवार का आरोप है कि जब महिला की मौत हो गई तो निजी नर्सिंग होम के डॉक्टरों ने एक निजी एंबुलेंस बुलाकर शव को दूसरे अस्पताल ले जाने की तैयारी शुरू कर दी। परिजनों ने जब विरोध किया तो वहां अफरा-तफरी मच गई। मृतका के परिजन और ग्रामीण फूट-फूट कर रोने लगे और सवाल उठाने लगे कि “जो मर चुकी है उसे कहां जिंदा करोगे.” घटना की जानकारी मिलते ही अल्लाबकसपुर गांव के ग्रामीण बड़ी संख्या में नर्सिंग होम पहुंच गए और संचालक की गिरफ्तारी की मांग को लेकर हंगामा शुरू कर दिया। सूचना मिलने पर गोपालपुर थाना पुलिस पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेजा गया। 16 अप्रैल को पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया, लेकिन आरोप है कि एक माह बीत जाने के बाद भी न तो प्राथमिकी की प्रति परिवार को उपलब्ध कराई गई और न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट दी गई।ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि घटना के बाद पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई का भरोसा तो दिया, लेकिन अब तक दोषियों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। जिस नर्सिंग होम पर गंभीर आरोप लगे, वह दो दिन बाद फिर से चालू हो गया। इससे लोगों में भारी आक्रोश है। मृतका का पति जीतू मांझी रविवार को न्याय की गुहार लेकर अधिकारियों और सामाजिक लोगों के पास पहुंचा। उसने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी की मौत इलाज के अभाव, सरकारी लापरवाही और निजी अस्पताल की लालच की वजह से हुई है। उसने कहा कि उसकी नवजात बच्ची हर दिन मां के बिना रोती है और परिवार उस दर्द को देखकर टूट जाता है। इधर सिविल सर्जन कार्यालय की ओर से मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय डॉक्टरों की टीम गठित की गई है। हालांकि स्थानीय लोग इसे केवल खानापूर्ति मान रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि समय पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में बेहतर सुविधा मिलती, रेफरल की जगह इलाज होता और निजी अस्पतालों की मनमानी पर रोक होती, तो शायद एक मां आज जिंदा होती। यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना है जहां गरीब की जिंदगी अक्सर रेफरल, दलाल और निजी अस्पतालों की लालच के बीच दम तोड़ देती है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस मासूम बच्ची को उसकी मां के लिए इंसाफ़ मिल पाएगा, या फिर यह मामला भी फाइलों और जांच समितियों के बीच दफन होकर रह जाएगा.

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