मगध विश्वविद्यालय में हटाए गए कार्यवाहक कुलपति, प्रो. दिलीप कुमार केसरी को मिली जिम्मेदारी
- राज्यपाल सह कुलाधिपति का बड़ा फैसला, तत्काल प्रभाव से लागू हुआ आदेश
- भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बीच बदला विश्वविद्यालय का नेतृत्व
पटना। बिहार के शैक्षणिक जगत में उस समय हलचल तेज हो गई जब राज्यपाल सह कुलाधिपति ने मगध विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर शशि प्रताप शाही को उनके पद से हटा दिया। उनकी जगह विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रोफेसर दिलीप कुमार केसरी को नया कार्यवाहक कुलपति नियुक्त किया गया है। राजभवन की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि यह नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू होगी और नियमित कुलपति की नियुक्ति होने या अगले आदेश तक प्रोफेसर दिलीप कुमार केसरी विश्वविद्यालय का कार्यभार संभालेंगे। राजभवन के इस फैसले के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षकों और छात्र संगठनों के बीच चर्चा का माहौल बन गया है। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि नए कार्यवाहक कुलपति बिना कुलाधिपति की अनुमति के कोई बड़ा नीतिगत फैसला नहीं ले सकेंगे। माना जा रहा है कि विश्वविद्यालय में प्रशासनिक पारदर्शिता बनाए रखने और विवादों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से यह निर्देश जारी किया गया है। दरअसल पिछले कुछ दिनों से मगध विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर शशि प्रताप शाही पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे थे। भारतीय जनता पार्टी के नेता और पूर्व सांसद सुशील कुमार सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर विश्वविद्यालय में कथित भ्रष्टाचार का मामला उठाया था। 13 मई 2026 को भेजे गए इस पत्र में आरोप लगाया गया था कि प्रोफेसर शाही के तीन वर्षों से अधिक के कार्यकाल में विश्वविद्यालय कोष से लगभग 150 से 200 करोड़ रुपये की निकासी की गई। शिकायत पत्र में दावा किया गया कि मगध विश्वविद्यालय के विभिन्न निधियों से बड़े पैमाने पर अनियमितता की गई और लोकधन का दुरुपयोग हुआ। पत्र में यह भी कहा गया कि इस मामले को लेकर पहले भी कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राजभवन को शिकायतें भेजी थीं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई थी। आरोपों के अनुसार विश्वविद्यालय में वित्तीय लेनदेन और भुगतान प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ियां हुईं, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पत्र में “केवल सच” नामक पत्रिका के जनवरी 2026 अंक का भी उल्लेख किया गया, जिसमें कुलपति पर लगे आरोपों को प्रकाशित किए जाने की बात कही गई थी। इसके अलावा पटना उच्च न्यायालय में भी इस मामले से जुड़ी दो जनहित याचिकाएं दायर होने की जानकारी दी गई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय के कुछ भुगतान मामलों में बड़े स्तर पर अनियमितताएं हुई हैं और इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। विशेष रूप से “चौधरी प्रिंटिंग प्रेस” को किए गए भुगतान को लेकर सवाल उठाए गए। शिकायत पत्र में दावा किया गया कि इस संस्था को लगभग 40 से 50 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जिसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। शिकायतकर्ता ने राज्यपाल से आग्रह किया था कि पूरे मामले की जांच किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष एजेंसी से कराई जाए तथा जांच पूरी होने तक कुलपति को उनके पद से हटाया जाए। अब राजभवन के ताजा फैसले को इसी घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि राजभवन की ओर से जारी आदेश में हटाए जाने के कारणों का विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में इसे शिकायतों और बढ़ते विवादों से जोड़कर देखा जा रहा है। मगध विश्वविद्यालय बिहार के प्रमुख विश्वविद्यालयों में से एक माना जाता है और यहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े विवादों का असर सीधे शैक्षणिक व्यवस्था पर पड़ता है। विश्वविद्यालय के कई शिक्षक और कर्मचारी इस फैसले को प्रशासनिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। फिलहाल नए कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर दिलीप Kumar केसरी के सामने विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था को स्थिर करने और छात्रों तथा शिक्षकों के बीच भरोसा कायम रखने की बड़ी चुनौती होगी। वहीं राजभवन के इस कदम के बाद मगध विश्वविद्यालय में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं।


