बिहार में मानसिक स्वास्थ्य मरीजों के लिए अलग वार्ड, सभी मेडिकल कॉलेज और सदर अस्पतालों में होगी व्यवस्था
- उच्च न्यायालय के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग का बड़ा फैसला, मनोचिकित्सकों की तैनाती भी सुनिश्चित होगी
- कोरोना के बाद बढ़े मानसिक रोगी, इलाज के साथ पुनर्वास पर भी रहेगा जोर
पटना। बिहार में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मरीजों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। अब राज्य के सभी मेडिकल कॉलेजों और सदर अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य रोगियों के लिए अलग से वार्ड की व्यवस्था की जाएगी। इसके साथ ही इन संस्थानों में मनोचिकित्सकों की तैनाती भी सुनिश्चित की जाएगी, ताकि मरीजों को समुचित और विशेषज्ञ उपचार मिल सके। स्वास्थ्य विभाग ने इस संबंध में सभी जिलों और मेडिकल कॉलेजों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। यह निर्णय पटना उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में लिया गया है, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य रोगियों के लिए बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। स्वास्थ्य विभाग के सचिव लोकेश कुमार सिंह ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे लोगों को केवल इलाज ही नहीं, बल्कि उनके पुनर्वास की भी समुचित व्यवस्था की जाएगी। इस दिशा में स्वास्थ्य विभाग और समाज कल्याण विभाग मिलकर कार्य करेंगे, ताकि मरीजों को सामाजिक रूप से भी पुनः स्थापित किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि आवश्यकता पड़ने पर मनोचिकित्सकों के नए पद सृजित किए जाएंगे, जिससे विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी को दूर किया जा सके। वर्तमान में कई अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की संख्या सीमित है, जिसके कारण मरीजों को पर्याप्त परामर्श और उपचार नहीं मिल पाता। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में राज्य भर में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे करीब एक लाख लोगों को विभिन्न अस्पतालों में परामर्श दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संख्या वास्तविक स्थिति से कम हो सकती है, क्योंकि कई लोग सामाजिक संकोच या जागरूकता की कमी के कारण इलाज के लिए सामने नहीं आते। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ मामलों में मरीजों को अपने ही परिवार का पूरा सहयोग नहीं मिल पाता, जिससे उनकी स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। ऐसे मरीजों के साथ असंवेदनशील व्यवहार उनकी मानसिक पीड़ा को बढ़ा देता है। इसलिए इलाज के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, कोरोना महामारी के बाद मानसिक रोगियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। लंबे समय तक घरों में बंद रहने, संक्रमण के डर और सामाजिक दूरी ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाला। इस दौरान लोग अधिक समय तक टीवी और मोबाइल पर निर्भर हो गए, जिससे मानसिक तनाव और अवसाद के मामलों में बढ़ोतरी हुई। इसके अलावा, सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर बढ़ते अकेलेपन ने भी मानसिक समस्याओं को बढ़ावा दिया है। बदलती जीवनशैली और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण लोगों में चिंता और तनाव का स्तर बढ़ा है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी प्रमुख बीमारियों में अवसाद, एकाग्रता की कमी, मानसिक तनाव, स्मृति ह्रास, व्यवहार संबंधी विकार, नशीले पदार्थों पर निर्भरता, भय, उन्माद और अत्यधिक चिंता जैसे विकार शामिल हैं। इन बीमारियों के समय पर उपचार और सही परामर्श से मरीजों की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है। सरकार का यह निर्णय न केवल मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करेगा, बल्कि इस क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने में भी सहायक साबित होगा। अलग वार्ड और विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता से मरीजों को बेहतर उपचार मिलेगा और उन्हें समाज में पुनः स्थापित करने में मदद मिलेगी। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि इस पहल से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों का नजरिया भी बदलेगा और अधिक से अधिक लोग उपचार के लिए आगे आएंगे। आने वाले समय में इस व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं, जिससे राज्य में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति में सुधार होगा।


