बिहार में मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति का नियम बदला, इंटरव्यू पर लगी रोक

पटना। बिहार सरकार ने राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। स्वास्थ्य विभाग की नई अधिसूचना के बाद भर्ती प्रक्रिया को लेकर चिकित्सा समुदाय में बहस तेज हो गई है। जहां एक ओर सरकार का दावा है कि नियम स्पष्ट होने से नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ रेजिडेंट डॉक्टरों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
भर्ती प्रक्रिया में आया ठहराव
राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पिछले दो वर्षों से असिस्टेंट प्रोफेसर के कई पद खाली पड़े हैं। इन पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया बिहार लोक सेवा आयोग ने अप्रैल 2025 में शुरू की थी। हालांकि, उस समय नियमों की स्पष्टता को लेकर सवाल उठे थे, जिसके कारण साक्षात्कार प्रक्रिया को रोक दिया गया। स्वास्थ्य विभाग ने अब नई अधिसूचना जारी कर पात्रता और चयन से जुड़े प्रावधानों को स्पष्ट किया है। विभाग का कहना है कि संशोधित नियमों के बाद अब लंबित बहाली प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकेगा और मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की कमी को दूर किया जा सकेगा।
नई अधिसूचना में क्या बदला
नई अधिसूचना के अनुसार, अप्रैल 2025 से लागू प्रावधानों के तहत किसी भी विषय में स्नातकोत्तर डिग्री और एक वर्ष की सीनियर रेजिडेंसी को असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए आवश्यक योग्यता माना गया है। इससे पहले अनुभव आधारित अतिरिक्त अंकों का प्रावधान था, जिसे अब हटा दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग का तर्क है कि यह बदलाव राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप किया गया है और इससे चयन प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी। अधिकारियों के अनुसार, नियमों की अस्पष्टता के कारण ही पहले साक्षात्कार रोके गए थे। अब स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलने के बाद आयोग चयन प्रक्रिया फिर से शुरू कर सकता है।
डॉक्टरों में बढ़ी नाराजगी
नए नियमों से सबसे अधिक असंतोष सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों के बीच देखा जा रहा है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के मानकों के तहत तीन वर्षों की सीनियर रेजिडेंसी पूरी कर चुके चिकित्सकों को पहले अनुभव के आधार पर अतिरिक्त अंक दिए जाते थे। नई नियमावली में इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत कई वरिष्ठ चिकित्सकों का कहना है कि यह निर्णय उनके अनुभव और सेवा अवधि की अनदेखी करता है। उनका आरोप है कि एक वर्ष का अनुभव रखने वाले डॉक्टर और तीन वर्ष या उससे अधिक अनुभव वाले डॉक्टर को समान श्रेणी में रख देना उचित नहीं है। पटना स्थित नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कार्यरत एक चिकित्सक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि इससे लंबे समय से सेवा दे रहे डॉक्टरों का मनोबल गिरेगा। उनका मानना है कि अनुभव का महत्व कम करना चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर डाल सकता है।
निजी संस्थानों को लाभ का आरोप
कुछ डॉक्टरों ने आरोप लगाया है कि बहाली प्रक्रिया के बीच में नियम बदलना संदेह पैदा करता है। उनका कहना है कि इससे निजी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े डॉक्टरों को सरकारी संस्थानों में नियुक्ति का अधिक अवसर मिल सकता है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने इन आरोपों को निराधार बताया है और कहा है कि सभी बदलाव नियमानुसार और पारदर्शिता के साथ किए गए हैं।
सरकार का पक्ष
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राज्य के मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी है, जिससे पढ़ाई और अस्पताल सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। ऐसे में बहाली प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करना आवश्यक है। विभाग का तर्क है कि राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप योग्यता तय करने से चयन प्रक्रिया में एकरूपता आएगी और विवाद की संभावना कम होगी।
आगे की स्थिति
नई अधिसूचना के बाद अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आयोग कब साक्षात्कार प्रक्रिया दोबारा शुरू करता है। यदि भर्ती जल्द पूरी होती है तो मेडिकल कॉलेजों में खाली पद भरे जा सकेंगे, जिससे छात्रों और मरीजों दोनों को लाभ मिलने की उम्मीद है। हालांकि डॉक्टरों के असंतोष को देखते हुए यह मुद्दा आगे भी तूल पकड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को पारदर्शिता बनाए रखने के साथ-साथ वरिष्ठ चिकित्सकों की चिंताओं पर भी संवाद करना चाहिए, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भरोसा कायम रहे। फिलहाल राज्य के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में बहाली को लेकर अनिश्चितता का माहौल है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि नियमों में बदलाव से चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था को स्थिरता मिलती है या फिर यह विवाद और गहराता है।

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