पटना में बड़े बैंक घोटाले का भंडाफोड़, निष्कासित कर्मचारी गिरफ्तार, खातों से 12 लाख का फर्जीवाड़ा
पटना। राजधानी पटना में हाल ही में एक ऐसे बैंक घोटाले का खुलासा हुआ है जिसने लोगों को चौंका दिया। यह मामला न केवल वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा है बल्कि बैंकिंग व्यवस्था की पारदर्शिता और सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। इस घोटाले में बैंक के एक निष्कासित कर्मचारी की गिरफ्तारी हुई है, जबकि मामले का मास्टरमाइंड माने जा रहे शाखा प्रबंधक की तलाश जारी है।
गिरफ्तारी की बड़ी कार्रवाई
पटना पुलिस ने मेरठ पुलिस की संयुक्त टीम के सहयोग से यह कार्रवाई अंजाम दी। गिरफ्तार किया गया आरोपी ऋषभ नंदन सिंह, केनरा बैंक की मेरठ स्थित छपरौली शाखा का कर्मचारी रह चुका है। बैंक प्रबंधन ने उस पर गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगने के बाद उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया था। भोपाल पुलिस की एक टीम पत्रकार नगर थाना पहुंची और वरीय पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर थाना प्रभारी सीतू कुमारी की अगुवाई में स्थानीय पुलिस के सहयोग से यह गिरफ्तारी की गई। विद्यापुरी इलाके से आरोपी को दबोचने में दरोगा संजीव और सिपाही मोहित चौधरी ने अहम भूमिका निभाई।
कैसे हुआ फर्जीवाड़ा
पूछताछ में सामने आया कि आरोपी ऋषभ नंदन सिंह ने अपने शाखा प्रबंधक रविन्द्र नाथ पंत के साथ मिलकर यह पूरा खेल रचा। आरोप है कि वर्ष 2024 में इन दोनों ने बैंक के उन खातों को निशाना बनाया जिन्हें लंबे समय से कोई संचालित नहीं कर रहा था। ऐसे खातों को बैंकिंग व्यवस्था में अनक्लेम्ड खातों की श्रेणी में रखा जाता है। आरोपियों ने चालाकी से इन खातों के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक से रकम रिक्लेम की और फिर उस धनराशि को अपने तथा सहयोगियों के खातों में ट्रांसफर कर दिया। इस तरह लगभग 12 लाख रुपये की अवैध उगाही कर ली गई।
मामला दर्ज और जांच की प्रक्रिया
जब यह मामला बैंक प्रबंधन के संज्ञान में आया तो 9 अप्रैल 2024 को छपरौली थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई। इसके बाद जांच शुरू हुई और धीरे-धीरे फर्जीवाड़े की परतें खुलने लगीं। जांच में यह साफ हुआ कि धोखाधड़ी की कार्यप्रणाली काफी संगठित तरीके से बनाई गई थी। बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना इतने बड़े स्तर पर रकम का ट्रांसफर संभव ही नहीं था। इसी वजह से बैंक ने आरोपी कर्मचारियों को तत्काल बर्खास्त कर दिया और पुलिस जांच को पूरी तरह से सहयोग दिया।
पुलिस का अगला कदम
इस मामले में भले ही आरोपी कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया गया हो, लेकिन पुलिस का ध्यान अब मुख्य आरोपी और कथित मास्टरमाइंड माने जा रहे बैंक मैनेजर रविन्द्र नाथ पंत की गिरफ्तारी पर केंद्रित है। माना जा रहा है कि घोटाले की असली योजना और नियंत्रण उनके हाथों में था। पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
बैंकिंग व्यवस्था पर सवाल
यह पूरा प्रकरण इस बात की ओर इशारा करता है कि बैंकिंग व्यवस्था में आंतरिक निगरानी और सुरक्षा तंत्र किस हद तक लापरवाह हो सकता है। अनक्लेम्ड खातों का इस तरह से दुरुपयोग होना साधारण बात नहीं है। ऐसे खाते आमतौर पर उन ग्राहकों से जुड़े होते हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जो लंबे समय से बैंक से लेन-देन नहीं कर रहे होते। यह मामला साबित करता है कि यदि पारदर्शिता और निगरानी के उचित साधन न हों तो बैंक कर्मचारी खुद अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।
समाज पर असर
बैंकिंग घोटाले हमेशा आम जनता का भरोसा तोड़ते हैं। लोग अपनी मेहनत की कमाई सुरक्षित रखने के लिए बैंकों पर निर्भर रहते हैं, लेकिन जब उन्हीं संस्थाओं से जुड़े लोग बेईमानी में शामिल पाए जाते हैं तो विश्वास डगमगा जाता है। इस तरह की घटनाएँ न केवल पीड़ित खाताधारकों के लिए चिंता का विषय बनती हैं बल्कि संपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था की साख को भी नुकसान पहुँचाती हैं। पटना में उजागर हुआ यह बैंक घोटाला हमें यह सिखाता है कि वित्तीय संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी कितनी आवश्यक है। यदि समय रहते बैंक प्रबंधन सतर्क न होता और पुलिस सक्रिय न होती तो यह घोटाला और भी बड़ा रूप ले सकता था। अब देखना यह है कि पुलिस इस मामले के मास्टरमाइंड को कब तक गिरफ्तार करती है और दोषियों को किस तरह की सजा मिलती है। इस प्रकरण से यह स्पष्ट है कि वित्तीय सुरक्षा को हल्के में लेना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कठोर कदम उठाना बेहद आवश्यक है।


