होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव का असर, भारत की एलपीजी आपूर्ति पर बढ़ी चिंता

  • युद्ध के बीच जोखिम भरे रास्ते से गुजरकर भारतीय टैंकर पहुंचे देश
  • भारतीय नौसेना की सुरक्षा में 90 हजार टन से अधिक गैस की आपूर्ति संभव

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दिखाई देने लगा है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़े खतरे ने भारत की रसोई गैस आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से होकर बड़ी मात्रा में ईंधन विभिन्न देशों तक पहुंचाया जाता है। हालिया तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई, जिससे भारत में गैस आपूर्ति को लेकर आशंका पैदा हो गई थी। हालांकि दो भारतीय टैंकरों के सुरक्षित देश पहुंचने से फिलहाल स्थिति सामान्य बनी हुई है और लोगों को राहत मिली है।
वैश्विक तनाव का ऊर्जा आपूर्ति पर प्रभाव
मध्य पूर्व क्षेत्र में बढ़ते सैन्य टकराव का सीधा असर ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ता है, क्योंकि इस क्षेत्र से दुनिया के कई देशों को कच्चा तेल और गैस की आपूर्ति होती है। होर्मुज जलडमरूमध्य इस आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख मार्ग है। वर्तमान परिस्थितियों में इस मार्ग पर सुरक्षा खतरे बढ़ गए हैं, जिससे कई जहाजों को अपनी यात्रा रोकनी पड़ी या वैकल्पिक रास्ते अपनाने पड़े। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो ईंधन की कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति में बाधा आ सकती है।
यात्रा अवधि में तीन गुना वृद्धि
सामान्य स्थिति में खाड़ी क्षेत्र से भारत तक गैस लेकर आने वाले टैंकरों को लगभग एक सप्ताह का समय लगता है, लेकिन मौजूदा हालात में यह अवधि लगभग तीन गुना तक बढ़ गई है। सुरक्षा कारणों से जहाजों को धीमी गति से चलना पड़ा और कई स्थानों पर अनुमति मिलने का इंतजार करना पड़ा। इससे आपूर्ति प्रक्रिया प्रभावित हुई और समय पर गैस पहुंचाने में कठिनाई आई।
जोखिम भरे मार्ग से होकर गुजरे जहाज
सूत्रों के अनुसार ‘पाइन गैस’ नाम का भारतीय ध्वज वाला गैस टैंकर संयुक्त अरब अमीरात के रुवाईस बंदरगाह से गैस लेकर भारत के लिए रवाना हुआ था। इसी दौरान क्षेत्र में अचानक सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं, जिससे समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गया। हालात इतने गंभीर हो गए कि जहाज को सामान्य मार्ग के बजाय ईरान के तट के पास स्थित लारक द्वीप के उत्तर से गुजरने वाले संकरे रास्ते से जाने का निर्देश दिया गया। यह मार्ग अपेक्षाकृत जोखिम भरा माना जाता है, लेकिन चालक दल की सहमति के बाद टैंकर ने इस रास्ते से यात्रा जारी रखी। चालक दल ने बताया कि यात्रा के दौरान समुद्र के ऊपर से मिसाइल और ड्रोन गुजरते दिखाई दे रहे थे, जिससे भय का माहौल बना हुआ था। जहाज को 11 मार्च को रवाना होना था, लेकिन सुरक्षा कारणों से अनुमति मिलने में देरी हुई और अंततः 23 मार्च को यात्रा शुरू की जा सकी। कठिन परिस्थितियों के बावजूद चालक दल ने साहस का परिचय दिया और सुरक्षित रूप से यात्रा पूरी की।
दो टैंकरों के पहुंचने से मिली राहत
कठिन हालात के बावजूद ‘पाइन गैस’ टैंकर भारत के कर्नाटक स्थित न्यू मैंगलोर बंदरगाह पर लगभग 45 हजार टन रसोई गैस लेकर पहुंचा। इसी प्रकार ‘जग वसंत’ नाम का एक अन्य भारतीय टैंकर गुजरात के कांडला बंदरगाह पर 47,612 टन गैस लेकर पहुंचा। इन दोनों जहाजों के सुरक्षित पहुंचने से देश में रसोई गैस की आपूर्ति को लेकर तत्काल राहत मिली है। कुल मिलाकर 90 हजार टन से अधिक गैस देश तक पहुंचाई जा सकी, जिससे संभावित कमी की आशंका कुछ समय के लिए टल गई है।
भारतीय नौसेना की महत्वपूर्ण भूमिका
इस पूरे अभियान में भारतीय नौसेना की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जानकारी के अनुसार चार भारतीय युद्धपोतों ने ओमान से लेकर अरब सागर तक लगभग 20 घंटे तक टैंकर को सुरक्षा प्रदान की। नौसेना की निगरानी में जहाज सुरक्षित रूप से आगे बढ़ सका और किसी बड़े खतरे से बचा रहा। सुरक्षा व्यवस्था के कारण चालक दल को भी आत्मविश्वास मिला और यात्रा सफलतापूर्वक पूरी हो सकी।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए चुनौती
मौजूदा घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो गया है कि वैश्विक स्तर पर होने वाले सैन्य तनाव का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है। यदि ऐसे मार्ग बाधित होते हैं तो देश में ईंधन की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है। इस बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि ईरान द्वारा भारतीय जहाजों को गुजरने देने के बदले कोई विशेष शुल्क या औपचारिक समझौता नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार जहाजों को सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराया गया और पूरी प्रक्रिया सामान्य तरीके से पूरी हुई।
भविष्य के लिए रणनीति जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे संकटों से बचने के लिए भारत को वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों और ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान देना होगा। साथ ही भंडारण क्षमता बढ़ाने और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत बनाने की आवश्यकता है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में देश की जरूरतों को पूरा किया जा सके। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने यह संकेत दिया है कि वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव भारत की रसोई गैस आपूर्ति पर पड़ सकता है। हालांकि फिलहाल दोनों टैंकरों के सुरक्षित पहुंचने से स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन भविष्य के लिए सतर्क रहने की आवश्यकता बनी हुई है।

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