गैस सिलेंडर की महंगाई से ग्रामीण रसोई पर संकट, शिवहर में फिर जले चूल्हे और उपले
- महंगी गैस और आपूर्ति की कमी से परेशान ग्रामीण परिवार, लकड़ी और गोबर के उपलों पर लौटे लोग
- महिलाओं का आरोप—सिलेंडर 2 से 2.5 हजार रुपये तक पहुंचा, समय पर गैस नहीं मिलने से बढ़ी परेशानी
शिवहर। बिहार के शिवहर जिले के ग्रामीण इलाकों में रसोई गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमत और समय पर गैस नहीं मिलने की समस्या ने लोगों को एक बार फिर पुराने समय के चूल्हों की ओर लौटा दिया है। महंगाई और गैस की आपूर्ति में कमी के कारण कई परिवार अब गोबर के उपले और सूखी लकड़ियों से खाना बनाने को मजबूर हो गए हैं। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि गैस सिलेंडर की कीमत इतनी अधिक हो गई है कि अब इसे भरवाना उनके घरेलू बजट के बाहर होता जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं के अनुसार पहले गैस सिलेंडर से खाना बनाना अपेक्षाकृत आसान और सुविधाजनक था, लेकिन अब महंगाई के कारण यह सुविधा धीरे-धीरे छिनती जा रही है। मजबूरी में उन्हें फिर से पारंपरिक चूल्हों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे न केवल अधिक मेहनत करनी पड़ती है बल्कि धुएं से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। ग्रामीण महिला मीरा देवी ने बताया कि उनके परिवार की आजीविका पूरी तरह खेती पर निर्भर है। परिवार में तीन बेटे हैं और पूरे घर का खर्च इसी खेती की आमदनी से चलता है। उन्होंने कहा कि बढ़ती महंगाई के कारण घर का खर्च चलाना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है कि परिवार को भोजन की चिंता भी सताने लगती है। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में गैस सिलेंडर की कीमत लगभग दो हजार से ढाई हजार रुपये तक पहुंच गई है। ऐसे में उनके जैसे गरीब परिवारों के लिए गैस सिलेंडर भरवाना संभव नहीं हो पा रहा है। मजबूर होकर उन्हें गोबर के उपले और चिपरी बनाकर चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है। मीरा देवी ने यह भी कहा कि उन्होंने उम्मीद के साथ मतदान किया था ताकि लोगों का जीवन आसान हो सके, लेकिन अब रसोई चलाना ही सबसे महंगा हो गया है। उन्होंने बताया कि उनके पति लगातार दो दिनों से गैस एजेंसी के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें गैस सिलेंडर नहीं मिल पाया है। उसी वार्ड की एक अन्य महिला, जो हाथ में गोबर के उपले लिए खड़ी थीं, ने भी अपनी परेशानी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि गैस की कीमत इतनी बढ़ गई है कि अब मजबूरी में फिर से गोबर और चिपरी पाथनी पड़ रही है। उनका कहना है कि पहले जिस कीमत पर गैस सिलेंडर मिल जाता था, उसी तरह इसे फिर से सस्ता किया जाना चाहिए ताकि गरीब परिवार भी आसानी से गैस का उपयोग कर सकें। गांव की सावित्री देवी ने भी महंगाई को लेकर चिंता जताई। उनके परिवार में पांच सदस्य हैं और सभी का खर्च सीमित आय से चलता है। उन्होंने कहा कि पहले और अब के समय में बहुत बड़ा अंतर आ गया है। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि आमदनी और खर्च का संतुलन बिगड़ गया है। उनके शब्दों में, आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया हो गया है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि यदि गैस सिलेंडर की कीमतों में कमी नहीं की गई और समय पर गैस उपलब्ध नहीं कराई गई तो ग्रामीण क्षेत्रों में एक बार फिर चूल्हा और उपलों का दौर स्थायी रूप से लौट सकता है। इससे ग्रामीण जीवन की कठिनाइयां और बढ़ जाएंगी। स्थानीय लोगों का मानना है कि सरकार को इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए ताकि ग्रामीण गरीब परिवारों को सस्ती और समय पर रसोई गैस उपलब्ध हो सके। उनका कहना है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक रसोई की सुविधा धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है और लोग फिर से पुराने पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हो जाएंगे।


