January 31, 2026

निजी एवं वैवाहिक संबंधों की जांच नहीं करता आरटीआई, सूचना आयोग ने दी जानकारी

नई दिल्ली। सूचना के अधिकार अधिनियम से जुड़ा एक अहम फैसला सामने आया है, जिसमें सूचना आयोग ने साफ कर दिया है कि आरटीआई का इस्तेमाल निजी और वैवाहिक संबंधों की जांच-पड़ताल के लिए नहीं किया जा सकता। आयोग ने यह टिप्पणी संतकबीर नगर की एक महिला की अपील को खारिज करते हुए की है। इस फैसले को आरटीआई की सीमाओं और उद्देश्य को स्पष्ट करने वाला माना जा रहा है।
अपील की पृष्ठभूमि और मामला
मामला उत्तर प्रदेश के संतकबीर नगर जिले से जुड़ा है। एक महिला ने पति से अलगाव के बाद सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत ग्राम पंचायत से कुछ जानकारियां मांगी थीं। महिला जानना चाहती थी कि क्या वह अपने पति के साथ विधिक पत्नी के रूप में रह रही है या नहीं। इसके अलावा उसने यह भी पूछा था कि यदि वह साथ नहीं रह रही है, तो ग्राम प्रधान को उसके वैवाहिक संबंधों के बारे में क्या जानकारी है। महिला ने अपने आवेदन में यह भी सवाल किया था कि क्या उसके पति ने अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी महिला को पत्नी के रूप में रखा है और उससे उत्पन्न बच्चों के नाम और उम्र क्या हैं।
जन सूचना अधिकारी का जवाब
महिला के आवेदन पर ग्राम पंचायत के जन सूचना अधिकारी ने स्पष्ट उत्तर दिया कि इस तरह की कोई भी जानकारी पंचायत के अभिलेखों में दर्ज नहीं है। अधिकारी ने कहा कि ग्राम पंचायत के रिकॉर्ड में नागरिकों के वैवाहिक संबंधों, निजी जीवन या पारिवारिक विवादों से जुड़ी कोई सूचना संरक्षित नहीं की जाती। इस जवाब से असंतुष्ट होकर महिला ने राज्य सूचना आयोग के समक्ष अपील दायर की।
सूचना आयोग में सुनवाई
अपील पर सुनवाई राज्य सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान आयोग ने मामले के तथ्यों और आरटीआई अधिनियम की भावना पर विस्तार से विचार किया। आयोग ने यह देखा कि मांगी गई जानकारी न केवल निजी प्रकृति की है, बल्कि ऐसी जानकारी का पंचायत स्तर पर कोई आधिकारिक रिकॉर्ड होना भी अपेक्षित नहीं है।
आरटीआई की सीमाओं पर स्पष्ट टिप्पणी
सूचना आयुक्त ने अपने आदेश में कहा कि आरटीआई अधिनियम पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का माध्यम है, न कि नागरिकों के निजी जीवन की निगरानी करने का उपकरण। आयोग ने टिप्पणी की कि ग्राम पंचायत से यह उम्मीद करना कि वह किसी व्यक्ति के वैवाहिक जीवन, निजी रिश्तों या पारिवारिक विवादों का लेखा-जोखा रखे, आरटीआई अधिनियम की भावना का अनावश्यक विस्तार है।
निजी संबंधों का सामाजिक रजिस्टर नहीं है आरटीआई
आयोग ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि आरटीआई अधिनियम पारदर्शिता का माध्यम है, न कि स्त्री-पुरुष के निजी रिश्तों का सामाजिक रजिस्टर। आयोग के अनुसार, सूचना का अधिकार नागरिकों को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता प्रदान करने के लिए है, न कि उन सवालों के जवाब देने के लिए जिनका संबंध पूरी तरह निजी जीवन से हो और जिनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद न हो।
भरोसे की सीमा तय करने की जरूरत
आयोग ने यह भी कहा कि आरटीआई के प्रति नागरिकों का बढ़ता भरोसा एक सकारात्मक संकेत है। अधिक से अधिक लोग इस कानून का सहारा लेकर सवाल पूछ रहे हैं, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा है। हालांकि, यह भरोसा इस हद तक नहीं जाना चाहिए कि सूचना तंत्र से ऐसी जानकारियां मांगी जाएं, जो अस्तित्व में ही नहीं हैं या जिन्हें रखना किसी सार्वजनिक प्राधिकरण का दायित्व नहीं है।
जन सूचना अधिकारी का उत्तर पर्याप्त
राज्य सूचना आयुक्त ने माना कि इस मामले में जन सूचना अधिकारी द्वारा दिया गया जवाब पूरी तरह पर्याप्त और सही है। अधिकारी ने स्पष्ट रूप से बता दिया था कि ग्राम पंचायत के पास इस तरह की कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। आयोग ने कहा कि जब कोई सूचना किसी रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं है, तो उसे उपलब्ध कराने का सवाल ही नहीं उठता।
अपील का निस्तारण
इन सभी तथ्यों और दलीलों के आधार पर सूचना आयोग ने महिला की अपील को निस्तारित कर दिया। आयोग ने कहा कि इस मामले में आगे किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आरटीआई अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
फैसले का व्यापक संदेश
इस फैसले को आरटीआई के दायरे को समझने के लिहाज से अहम माना जा रहा है। यह आदेश स्पष्ट करता है कि सूचना का अधिकार कानून नागरिकों को सरकारी दस्तावेजों और निर्णयों में पारदर्शिता देता है, लेकिन यह निजी जीवन के विवादों को सुलझाने का मंच नहीं है। ऐसे मामलों में संबंधित पक्षों को अदालत या अन्य वैधानिक मंचों का सहारा लेना चाहिए। सूचना आयोग का यह फैसला भविष्य में भी उन मामलों के लिए मार्गदर्शक माना जाएगा, जहां आरटीआई के जरिए निजी और व्यक्तिगत जानकारियां हासिल करने की कोशिश की जाती है।

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