August 29, 2026

बिहार कांग्रेस में बगावत तेज, 8 सितंबर को दिल्ली में नाराज नेताओं का धरना

  • नाराज नेताओं ने प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम को हटाने की मांग उठाई
  • चुनावी हार के बाद बढ़ी नाराजगी, कांग्रेस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन की तैयारी

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में करारी हार के बाद प्रदेश कांग्रेस में शुरू हुई अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी के असंतुष्ट नेता अब बिहार में विरोध करने के बजाय सीधे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व तक अपनी आवाज पहुंचाने की तैयारी में हैं। नाराज नेताओं ने 8 सितंबर को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन के बाहर धरना-प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से किया जाएगा। नाराज नेताओं की प्रमुख मांग बिहार कांग्रेस प्रभारी महासचिव कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम को उनके पदों से हटाने की है। नेताओं का आरोप है कि मौजूदा नेतृत्व के कारण प्रदेश संगठन कमजोर हुआ है और चुनावी प्रदर्शन में भी इसका असर दिखाई दिया।
चुनावी हार के बाद बढ़ा असंतोष
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस ने 61 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन पार्टी को सिर्फ छह सीटों पर जीत मिली। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 71 सीटों पर चुनाव लड़कर 19 सीटें जीती थीं। पांच साल के अंतराल में सीटों की संख्या में आई यह बड़ी गिरावट पार्टी के भीतर असंतोष का प्रमुख कारण बनी। चुनावी नतीजों के बाद संगठन की रणनीति, नेतृत्व और जमीनी स्तर पर पार्टी की स्थिति को लेकर सवाल उठने लगे। अब यही नाराजगी बिहार से निकलकर दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय तक पहुंचने वाली है।
हाईकमान से शिकायत के बाद भी नहीं बनी बात
धरने की तैयारी कर रहे नेताओं का दावा है कि उन्होंने बिहार कांग्रेस से जुड़ी अपनी शिकायतें पहले ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने रख दी थीं। एआईसीसी सदस्य आनंद माधव के अनुसार, 3 नवंबर 2025 को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और अशोक गहलोत समेत राष्ट्रीय नेताओं के सामने बिहार संगठन की समस्याएं रखी गई थीं। नाराज नेताओं का कहना है कि उस समय शिकायतों पर विचार करने और उचित कार्रवाई का भरोसा दिया गया था। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात के लिए समय भी मांगा, लेकिन अब तक मुलाकात नहीं हो सकी। नेताओं का दावा है कि लगातार अनदेखी के कारण ही अब उन्हें धरने का रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
जिलों में बैठकें, आंदोलन की तैयारी
असंतुष्ट नेताओं ने संकेत दिया है कि उनका आंदोलन केवल 8 सितंबर के धरने तक सीमित नहीं रहेगा। अलग-अलग जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें की जा रही हैं। इस दौरान ‘कृष्णा अल्लावरू हटाओ, कांग्रेस बचाओ’ जैसे नारों के साथ अभियान चलाने की बात भी सामने आई है। आंदोलन से जुड़े नेताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य कांग्रेस को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि संगठन को मजबूत करना और कार्यकर्ताओं की समस्याओं को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाना है। उनका दावा है कि संगठन में सुधार और नेतृत्व में बदलाव से ही बिहार में पार्टी को दोबारा मजबूत किया जा सकता है।
संगठन सृजन अभियान के बीच उठे सवाल
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब कांग्रेस बिहार में संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी की ओर से संगठन सृजन अभियान के माध्यम से प्रखंड और पंचायत स्तर तक संगठन को सक्रिय करने पर जोर दिया जा रहा है। अगस्त में नए प्रखंड अध्यक्षों के लिए गांधीवादी तरीके से आंदोलन और जनसंपर्क से जुड़ी प्रशिक्षण गतिविधियां भी शुरू की गई थीं। पार्टी जहां जमीनी स्तर पर संगठन विस्तार की तैयारी कर रही है, वहीं इसी दौरान प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ असंतोष खुलकर सामने आने से कांग्रेस की मुश्किल बढ़ गई है।
हाईकमान के सामने अब दोहरी चुनौती
बिहार कांग्रेस में जारी विवाद ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के सामने भी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ संगठन को चुनावी हार से उबारने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर ही नेतृत्व परिवर्तन की मांग जोर पकड़ रही है। नाराज नेताओं का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी शिकायतें पार्टी नेतृत्व तक पहुंचाते रहे हैं। उनका दावा है कि जब उनकी बात नहीं सुनी गई तो उन्हें दिल्ली में प्रदर्शन का निर्णय लेना पड़ा।
अब निगाहें 8 सितंबर पर
बिहार कांग्रेस के लिए अब 8 सितंबर महत्वपूर्ण तारीख बन गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस हाईकमान धरने से पहले असंतुष्ट नेताओं को बातचीत के लिए बुलाकर विवाद को शांत कर पाएगा या फिर इंदिरा भवन के बाहर प्रस्तावित प्रदर्शन से प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई राष्ट्रीय स्तर पर खुलकर सामने आएगी। फिलहाल इतना साफ है कि चुनावी हार के बाद शुरू हुई नाराजगी अब केवल पार्टी के भीतर की चर्चा नहीं रह गई है। नेतृत्व परिवर्तन की मांग के साथ असंतुष्ट नेताओं का दिल्ली पहुंचना बिहार कांग्रेस में गहराते संगठनात्मक संकट का संकेत माना जा रहा है।