February 10, 2026

एसआईआर के खिलाफ ममता बनर्जी सख्त, बंगाल विधानसभा में प्रस्ताव पारित, अबतक 107 की मौत

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी और सामाजिक तनाव गहराता जा रहा है। गुरुवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा में इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें दावा किया गया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया से उपजी घबराहट और मानसिक तनाव के कारण अब तक 107 लोगों की मौत हो चुकी है। सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पूरे मामले के लिए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया है।
विधानसभा में पेश हुआ गंभीर प्रस्ताव
पश्चिम बंगाल विधानसभा में पेश प्रस्ताव में कहा गया है कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण के नाम पर राज्य में भय और असुरक्षा का माहौल बनाया गया है। प्रस्ताव के अनुसार, बड़ी संख्या में लोग इस डर से जूझ रहे हैं कि कहीं उनके नाम मतदाता सूची से हटा न दिए जाएं। इसी मानसिक दबाव और चिंता के कारण 107 लोगों की जान जाने का दावा किया गया है। इनमें आत्महत्या के मामले भी शामिल बताए गए हैं।
एसआईआर क्या है और क्यों बढ़ा विवाद
विशेष गहन पुनरीक्षण चुनाव आयोग की एक प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता सूची को अद्यतन किया जाता है। इसका उद्देश्य फर्जी या दोहरे नाम हटाना और वास्तविक मतदाताओं को सूची में शामिल करना होता है। लेकिन बंगाल में इस प्रक्रिया को लेकर स्थिति अलग है। सत्ताधारी दल का आरोप है कि यह प्रक्रिया राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की तरह लागू की जा रही है, जिससे आम लोगों में डर बैठ गया है कि उनकी नागरिकता पर सवाल उठ सकते हैं।
एनआरसी की आशंका और लोगों का डर
तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि लोगों को लग रहा है कि अगर उनके पास पुराने दस्तावेज, खासकर 1971 या उससे पहले के कागजात नहीं हुए, तो उन्हें अवैध घुसपैठिया घोषित किया जा सकता है। यह डर असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के दौरान हुई घटनाओं से और गहरा हो गया है। कई परिवारों को यह चिंता सता रही है कि उनका नाम मतदाता सूची से हट सकता है और इससे उनके लोकतांत्रिक अधिकार छिन सकते हैं।
ममता बनर्जी का केंद्र और भाजपा पर हमला
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विधानसभा में कहा कि हर दिन राज्य में तीन से चार लोग इस डर के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी बंगाल को निशाना बना रही है। उनके मुताबिक, यह पूरी कवायद पिछले दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू करने की कोशिश है। मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में लोगों को डराकर वोटर लिस्ट से बाहर करना स्वीकार्य नहीं है।
चुनाव आयोग पर भी उठे सवाल
प्रस्ताव में भारत निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। राज्य सरकार का आरोप है कि आयोग इस मामले में निष्पक्ष भूमिका नहीं निभा रहा है और केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इन मौतों की नैतिक जिम्मेदारी चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को लेनी चाहिए।
भाजपा ने आरोपों को बताया बेबुनियाद
विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस जानबूझकर लोगों के बीच अफवाहें फैला रही है ताकि चुनावी फायदा उठाया जा सके। उनके मुताबिक, जिन मौतों का हवाला दिया जा रहा है, वे व्यक्तिगत त्रासदियां हैं और उन्हें राजनीतिक रंग देना गलत है। भाजपा का यह भी कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक सामान्य और नियमित प्रक्रिया है, जिसे डर से जोड़ना अनुचित है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
इस पूरे विवाद के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उन्होंने अदालत से विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की मांग की है ताकि लोकतंत्र की रक्षा की जा सके। खास बात यह रही कि ममता बनर्जी खुद अदालत में बहस करने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने कहा कि बंगाल के लोगों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है और राज्य को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।
संवेदनशील बनता जा रहा मुद्दा
हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण उसकी नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है और इसका उद्देश्य केवल मतदाता सूची को दुरुस्त करना है। आयोग का तर्क है कि किसी भी नागरिक की नागरिकता पर सवाल उठाना उसका काम नहीं है। बावजूद इसके, बंगाल में सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच जारी टकराव के कारण यह प्रक्रिया बेहद संवेदनशील मुद्दा बन चुकी है।
आगे क्या होंगे असर
मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर पैदा हुआ यह विवाद आने वाले चुनावों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। जहां एक तरफ राज्य सरकार इसे लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों से जोड़कर देख रही है, वहीं विपक्ष इसे प्रशासनिक प्रक्रिया बता रहा है। इन सबके बीच आम जनता का डर और असमंजस सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है, जिसे दूर करना अब चुनाव आयोग और सरकार दोनों के लिए बड़ी चुनौती होगा।

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