सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर मामले में 12 को अगली सुनवाई, याचिकाकर्ताओं को लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश जारी
पटना। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान चलाया जा रहा है। यह प्रक्रिया मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित या अपात्र लोगों के नाम हटाने के लिए की जा रही है। चुनाव आयोग के अनुसार, अब तक 65 लाख नाम हटा दिए गए हैं, जिनमें 22 लाख मृतक और 36 लाख अन्य राज्य या स्थानों में चले गए मतदाता शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा
हालांकि यह प्रक्रिया अब कानूनी विवादों में घिर गई है। सुप्रीम कोर्ट में इस पर दायर याचिकाओं की सुनवाई न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ कर रही है। मंगलवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को 8 अगस्त तक अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई की तारीख 12 अगस्त तय की गई है।
कोर्ट का रुख और दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल एसआईआर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है, जिससे यह संकेत मिला है कि कोर्ट सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहता। हालांकि, कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह सुझाव जरूर दिया है कि आधार और वोटर आईडी जैसे दस्तावेजों को प्रमाण के रूप में मान्यता दी जाए ताकि सही मतदाता सूची सुनिश्चित हो सके। यह एक संतुलित रुख माना जा रहा है जिसमें न्यायपालिका मतदाता अधिकारों की रक्षा और निष्पक्ष प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं – कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और गोपाल शंकर नारायण ने अपनी दलीलें दीं। उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर अभियान में तय नियमों की अनदेखी की गई है और यह खासतौर पर महिलाओं, गरीबों और अल्पसंख्यकों को मतदाता सूची से हटाने का जरिया बन सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि कई लोगों को बिना पूर्व सूचना या सुनवाई का अवसर दिए ही सूची से बाहर कर दिया गया है।
चुनाव आयोग का पक्ष
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को यह आश्वासन दिया है कि बिना सुनवाई के किसी भी वैध मतदाता का नाम सूची से नहीं हटाया जाएगा। आयोग का दावा है कि यह प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता और नियमों के तहत हो रही है।
राजनीतिक और संवैधानिक प्रभाव
बिहार, जो देश के सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्यों में से एक है, वहां यह मामला चुनाव से पहले काफी चर्चा में आ गया है। यह न सिर्फ राज्य के लाखों मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि यह तय करेगा कि मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया देशभर में कितनी निष्पक्ष और विश्वसनीय है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। एसआईआर से जुड़ा यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि यह संविधान में मिले मतदाता अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा विषय बन चुका है। अब सबकी नजर 12 और 13 अगस्त की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी है, जो इस विवाद को कानूनी और नैतिक दिशा दे सकती है।


