सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, 13 साल से कोमा में गए हरीश राणा को दी इच्छामृत्यु की अनुमति

नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 13 वर्षों से कोमा की स्थिति में जीवन बिता रहे हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है। अदालत ने यह फैसला लंबे समय से चल रही चिकित्सा स्थिति और परिवार की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी जा रही है, जिसमें चिकित्सकीय उपचार को चरणबद्ध तरीके से बंद किया जाएगा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही जनवरी में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने न केवल चिकित्सा रिपोर्टों का अध्ययन किया, बल्कि पीड़ित के परिवार से भी व्यक्तिगत रूप से बातचीत कर उनकी भावनाओं को समझने का प्रयास किया।
न्यायाधीशों ने परिवार से की थी मुलाकात
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ कर रही थी। 13 जनवरी को दोनों न्यायाधीशों ने हरीश राणा के माता-पिता और उनके छोटे भाई से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के दौरान परिवार ने अदालत को बताया कि वे नहीं चाहते कि हरीश राणा को और अधिक पीड़ा सहनी पड़े। परिवार का कहना था कि पिछले कई वर्षों से वे उन्हें उसी स्थिति में देख रहे हैं और यह उनके लिए भी अत्यंत पीड़ादायक है। परिवार ने अदालत से अनुरोध किया कि यदि चिकित्सा उपचार से कोई लाभ नहीं हो रहा है तो उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति दिलाई जाए।
2012 में हुआ था दर्दनाक हादसा
हरीश राणा की जिंदगी एक दुर्घटना के बाद पूरी तरह बदल गई थी। यह घटना वर्ष 2012 की है, जब वे चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। पढ़ाई के दौरान वे एक पेयिंग गेस्ट आवास में रहते थे। 20 अगस्त 2012 को रक्षाबंधन के दिन वह अपने आवास की चौथी मंजिल की बालकनी से गिर गए थे। इस दुर्घटना में उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी। हादसे के बाद उनकी स्थिति बेहद गंभीर हो गई और उनका शरीर पूरी तरह निष्क्रिय हो गया।
स्थायी वनस्पतिक अवस्था में थे राणा
डॉक्टरों के अनुसार दुर्घटना के बाद हरीश राणा स्थायी वनस्पतिक अवस्था में चले गए थे। इस स्थिति में व्यक्ति कभी-कभी अपनी आंखें खोल सकता है, लेकिन वह अपने आसपास की गतिविधियों को समझने या प्रतिक्रिया देने में सक्षम नहीं होता। डॉक्टरों ने बताया कि हरीश राणा न तो अपनी आंखें खोल पा रहे थे और न ही हाथ-पैर हिला सकते थे। पिछले 13 वर्षों से वे इसी स्थिति में अस्पताल में उपचार प्राप्त कर रहे थे।
चिकित्सकीय रिपोर्ट में नहीं दिखी सुधार की संभावना
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नोएडा के एक अस्पताल के प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड की रिपोर्ट का भी अध्ययन किया था। इस रिपोर्ट में डॉक्टरों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि हरीश राणा के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। रिपोर्ट देखने के बाद अदालत ने भी चिंता व्यक्त की थी। न्यायालय ने कहा था कि इस तरह की स्थिति में किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जीवित रखना अत्यंत कठिन और पीड़ादायक हो सकता है। अदालत ने यह भी कहा था कि अब इस मामले में कोई निर्णय लेना आवश्यक है।
परिवार की भावनाओं को दिया महत्व
सुनवाई के दौरान अदालत ने परिवार की भावनाओं को भी गंभीरता से लिया। न्यायालय ने कहा कि परिवार पिछले कई वर्षों से इस कठिन स्थिति का सामना कर रहा है। परिवार का कहना था कि यदि उपचार से कोई लाभ नहीं मिल रहा है, तो उसे जारी रखने का कोई अर्थ नहीं है। परिवार ने अदालत से यह भी कहा था कि हरीश राणा अत्यधिक पीड़ा में हैं और उन्हें इस कष्ट से मुक्ति मिलनी चाहिए। अदालत ने इन भावनाओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु की दी गई अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने 32 वर्षीय हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है। इसका अर्थ यह है कि उन्हें जीवित रखने के लिए दिए जा रहे कृत्रिम चिकित्सा उपचार को धीरे-धीरे बंद किया जाएगा। अदालत ने निर्देश दिया कि यह प्रक्रिया पूरी सावधानी और व्यवस्थित तरीके से की जाए ताकि मरीज की गरिमा बनी रहे। अदालत ने यह भी कहा कि उपचार को अचानक बंद नहीं किया जाएगा, बल्कि चिकित्सा मानकों के अनुसार चरणबद्ध तरीके से रोका जाएगा।
आर्थिक और मानसिक दबाव भी बना कारण
अदालत ने अपने अवलोकन में यह भी कहा कि लंबे समय से चल रहे उपचार के कारण परिवार पर आर्थिक और मानसिक दबाव भी बढ़ गया था। चिकित्सा खर्च का बोझ उठाना परिवार के लिए लगातार कठिन होता जा रहा था। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि फैसला केवल आर्थिक कारणों के आधार पर नहीं बल्कि मरीज की चिकित्सकीय स्थिति और मानव गरिमा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
मानवीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। अदालत ने इस मामले में मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता देते हुए निर्णय दिया है। इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं होती और वह लंबे समय तक असहनीय पीड़ा में होता है, तो अदालत विशेष परिस्थितियों में इच्छामृत्यु की अनुमति दे सकती है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल एक कानूनी निर्णय है बल्कि मानवीय संवेदनाओं को समझने और सम्मान देने का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

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