अफ्रीका से आई मादा चीता फिर बनी मां, तीन नए शावकों दिया जन्म, भारत में 38 हुई चीतों की संख्या
नई दिल्ली। भारत में चीतों के संरक्षण और पुनर्वास की दिशा में एक बार फिर उत्साहजनक खबर सामने आई है। मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो राष्ट्रीय उद्यान में दक्षिण अफ्रीका से लाई गई चीता गामिनी ने तीन नए शावकों को जन्म दिया है। 18 फरवरी 2026 को हुए इस प्रसव के साथ ही भारत में चीतों की संख्या बढ़कर 38 हो गई है। यह घटना न केवल वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, बल्कि देश में चीतों के भविष्य को लेकर उम्मीदों को भी मजबूत करती है।
तीन साल बाद फिर खुशखबरी
भारत में चीतों की वापसी को लेकर चल रही परियोजना को तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस दौरान कई चुनौतियों और कठिनाइयों के बावजूद संरक्षण प्रयास लगातार जारी रहे। ऐसे में गामिनी का दूसरी बार मां बनना इस परियोजना की सफलता का अहम संकेत माना जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार यह भारतीय धरती पर चीतों का नौवां सफल प्रसव है, जो यह दर्शाता है कि यहां का पर्यावरण और संरक्षण व्यवस्था चीतों के लिए अनुकूल होती जा रही है।
गामिनी और उसके नए शावक
गामिनी दक्षिण अफ्रीका से भारत लाई गई उन चीताओं में शामिल है, जिन्हें विशेष योजना के तहत कूनो राष्ट्रीय उद्यान में बसाया गया था। 18 फरवरी को उसने तीन स्वस्थ शावकों को जन्म दिया। वन विभाग के विशेषज्ञों की टीम लगातार इन शावकों की निगरानी कर रही है। शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार मां और तीनों शावक पूरी तरह सुरक्षित हैं और उनका स्वास्थ्य सामान्य बताया जा रहा है।
भारत में बढ़ती चीता आबादी
नए शावकों के जन्म के बाद भारत में चीतों की कुल संख्या 38 हो गई है। इनमें से 27 शावक भारत में ही जन्मे हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि चीता पुनर्वास कार्यक्रम धीरे-धीरे अपने उद्देश्य की ओर बढ़ रहा है। अधिकारियों का कहना है कि यह संख्या केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश की जैव विविधता को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
कूनो बना चीता संरक्षण का केंद्र
कूनो राष्ट्रीय उद्यान को चीता पुनर्वास के लिए इसलिए चुना गया था क्योंकि यहां का प्राकृतिक वातावरण, घास के मैदान और शिकार की उपलब्धता चीतों के अनुकूल मानी जाती है। बीते वर्षों में यहां निगरानी व्यवस्था, पशु चिकित्सकीय सुविधा और सुरक्षा प्रबंधों को लगातार मजबूत किया गया है। इसका परिणाम अब साफ तौर पर दिखाई देने लगा है, जब चीताएं न केवल यहां जीवित रह पा रही हैं, बल्कि सफलतापूर्वक प्रजनन भी कर रही हैं।
अन्य अभयारण्यों में भी विस्तार
चीता परियोजना के तहत केवल कूनो तक ही सीमित न रहकर अन्य क्षेत्रों में भी विस्तार किया जा रहा है। वर्तमान में तीन चीते मंदसौर जिले के गांधी सागर अभयारण्य में भेजे गए हैं, जबकि शेष चीते कूनो राष्ट्रीय उद्यान में ही रह रहे हैं। इसका उद्देश्य चीतों के लिए वैकल्पिक और सुरक्षित आवास विकसित करना है, ताकि भविष्य में उनकी आबादी को और फैलाया जा सके।
संरक्षण प्रयासों का ऐतिहासिक महत्व
भारत में चीतों को दोबारा बसाने की यह कोशिश ऐतिहासिक मानी जाती है। देश में चीते वर्षों पहले विलुप्त हो चुके थे। ऐसे में अफ्रीका से चीतों को लाकर उन्हें भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालना एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है। शुरुआती दौर में कुछ चीतों की मृत्यु ने चिंता जरूर बढ़ाई थी, लेकिन लगातार सुधार और वैज्ञानिक निगरानी के चलते अब स्थिति बेहतर होती दिख रही है।
वन्यजीव विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि गामिनी द्वारा तीन शावकों को जन्म देना इस बात का संकेत है कि चीते भारतीय जलवायु और पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाने लगे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि इसी तरह संरक्षण और निगरानी जारी रही, तो आने वाले वर्षों में चीता आबादी में और इजाफा हो सकता है। यह न केवल जैव विविधता के लिए लाभकारी होगा, बल्कि पर्यटन और स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ाएगा।
स्थानीय स्तर पर खुशी का माहौल
गामिनी के शावकों के जन्म की खबर से कूनो और आसपास के इलाकों में खुशी का माहौल है। स्थानीय लोग इसे अपने क्षेत्र के लिए गर्व की बात मान रहे हैं। प्रशासन भी इस सफलता को संरक्षण प्रयासों की बड़ी जीत के रूप में देख रहा है। वन विभाग ने कहा है कि शावकों की सुरक्षा और देखभाल में किसी तरह की कमी नहीं बरती जाएगी।
भविष्य को लेकर उम्मीद
तीन नए शावकों के साथ भारत में चीतों की संख्या 38 तक पहुंचना यह दिखाता है कि सही रणनीति और निरंतर प्रयासों से विलुप्त प्रजातियों को भी दोबारा बसाया जा सकता है। आने वाले समय में सरकार और वन विभाग की योजना चीतों के लिए और सुरक्षित आवास विकसित करने तथा उनकी संख्या को स्थायी रूप से बढ़ाने की है। कूनो राष्ट्रीय उद्यान में गामिनी द्वारा तीन शावकों को जन्म देना भारत के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है। यह उपलब्धि न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से अहम है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि प्रकृति को मौका दिया जाए तो वह स्वयं को फिर से संवार सकती है।


