ममता बनर्जी की विपक्षी एकता की अपील को कांग्रेस और वाम दलों ने किया खारिज

  • भाजपा के खिलाफ संयुक्त मोर्चे की अपील पर कांग्रेस और वामपंथियों का तीखा हमला
  • बंगाल की बदली राजनीति में पुराने विरोधी दलों के साथ आने की राह कठिन

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद अब विपक्षी दलों के बीच नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर हलचल तेज हो गई है। 15 वर्षों बाद सत्ता से बाहर हुईं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्षी एकता का आह्वान किया था, लेकिन उनके इस प्रस्ताव को कांग्रेस और वाम दलों ने सिरे से खारिज कर दिया है। ममता बनर्जी ने शनिवार को वीडियो संदेश जारी कर भाजपा के खिलाफ सभी विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और गैर सरकारी संगठनों से एकजुट होने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि भाजपा का मुकाबला करने के लिए एक साझा मंच बनाया जाना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ वामपंथी और अति-वामपंथी दलों से भी एकजुट होने का आग्रह किया था। हालांकि ममता बनर्जी की इस अपील के तुरंत बाद कांग्रेस और वाम दलों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के प्रवक्ता सौम्य आइच राय ने ममता बनर्जी के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा है। उन्होंने पूछा कि अति-वामपंथियों से उनका क्या आशय है। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि यदि ममता बनर्जी का संकेत माओवादी संगठनों की ओर है, तो यह गंभीर विषय है। उन्होंने वर्ष 2013 में छत्तीसगढ़ में हुए उस हमले का उल्लेख किया, जिसमें कई कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या हुई थी। कांग्रेस ने साफ संकेत दिया कि वह इस प्रकार की राजनीतिक एकता के पक्ष में नहीं है। कांग्रेस के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (लेनिनवादी) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने भी ममता बनर्जी के प्रस्ताव को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी किसी भी ऐसी राजनीतिक शक्ति के साथ नहीं जाएगी, जिस पर अपराध, भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और सांप्रदायिक राजनीति के आरोप लगे हों। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी जनता और समाज के हाशिए पर खड़े लोगों के साथ संघर्ष जारी रखेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी का यह आह्वान पश्चिम बंगाल की बदली हुई राजनीतिक स्थिति को दर्शाता है। एक समय कांग्रेस और वाम दलों के विरोध के आधार पर राजनीति करने वाली ममता बनर्जी अब उन्हीं दलों से सहयोग की अपील कर रही हैं। इसी विरोध की राजनीति के दम पर उन्होंने वाम मोर्चे की तीन दशक पुरानी सत्ता को समाप्त कर बंगाल में अपनी सरकार बनाई थी। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत और सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी ने भाजपा को सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बताते हुए विपक्षी दलों से एक मंच पर आने की अपील की। हालांकि जमीनी स्तर पर कांग्रेस, वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस के बीच लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और संघर्ष इस एकता की राह में बड़ी बाधा माने जा रहे हैं। बंगाल में वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच हुए हिंसक संघर्ष की घटनाएं अभी भी लोगों की स्मृति में ताजा हैं। ऐसे में इन दलों का साथ आना आसान नहीं माना जा रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ममता बनर्जी विपक्षी दलों को साथ लाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन राजनीतिक अविश्वास और पुराने मतभेद इस प्रयास को कमजोर कर सकते हैं। विधानसभा चुनाव में वाम दलों का प्रदर्शन भी बेहद कमजोर रहा। अधिकांश सीटों पर वामपंथी दल अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। कांग्रेस की स्थिति भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही। इसके बावजूद विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस के साथ खुलकर आने से बचते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं, लेकिन फिलहाल विपक्षी एकता की राह काफी कठिन दिखाई दे रही है। भाजपा की बढ़ती ताकत और विपक्षी दलों के आपसी मतभेद राज्य की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं।

You may have missed