बिहार में करीब 4 मिलियन डिस्पोजेबल सेनेटरी नैपकीन होते हैं जनित, निपटान हेतु जागरूकता करने की है आवश्यकता
पटना। मानवीय क्रिय कलापों से जनित ठोस अपशिष्टों के व्यवस्थित प्रबंधन हेतु पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत पुराने संबंधित नियमावली का अधिक्रमण करते हुए मार्च, 2016 में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली, 2016 अधिसूचित किया गया। सामान्य कचरों के व्यवस्थित निपटान के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, साथ ही स्थानीय निकाय भी इस व्यवस्थित प्रबंधन के प्रति अब ज्यादा सजग है, जबकि देश में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में जनित सेनेटरी अपशिष्टों के प्रबंधन हेतु बहुत कुछ किया जाना शेष है।
ऐसे अपशिष्टों में इस्तेमाल किये गये डायपर्स, सेनेटरी टॉवेल अथवा नैपकिन, टैम्पोन, कंडोम एवं इसी तरह के अन्य कचरे शामिल हैं। ऐसे उत्पाद मुख्यता सेल्यूलोज, उत्तम शोषक पॉलीमर, प्लास्टिक कवरिंग, चिपकने वाले गोंद-ग्लू इत्यादि से बने होते हैं एवं जैव-अविघटनकारी होता हंै। इनका व्यवस्थित निपटान नहीं होना मृदा, जल, मानव व पर्यावरण के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है। एक अनुमान के अनुसार, देश में प्रतिदिन लगभग 33 मिलियन तथा बिहार में करीब 4 मिलियन ऐसे डिस्पोजेबल सेनेटरी नैपकीन जनित होते हैं।
ऐसे अपशिष्टों के समुचित निपटान हेतु सूचना, संचार व शिक्षा के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है।
मामले की गंभीरता का संज्ञान लेते हुए बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद् द्वारा राज्य के नगर विकास एवं आवास विभाग, पंचायती राज विभाग एवं ग्रामीण विकास विभाग को पत्र लिखकर न केवल उपरोक्त नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने बल्कि जन-सामान्य में मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जागरूकता पैदा करने का भी अनुरोध किया गया है। राज्य पर्षद् द्वारा ऐसे उत्पादों के प्रमुख विनिर्मात्ताओं यथा सर्वश्री प्रॉक्टर एंड गैम्बल, किम्बरली क्लार्क, जॉनसन एंड जॉनसन, यूनिचार्म इंडिया, नाइन एवं अन्य को पत्र प्रेषित करते हुए राज्य में उक्त नियमों के अनुपालन की स्थिति संबंध्ी प्रतिवेदन समर्पित करने का निदेश दिया गया है।


