दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में शिक्षक बहाली प्रक्रिया में धांधली का आरोप, दर्ज हुई कई आपत्तियां
>>दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में मीडिया विभाग की बहाली प्रक्रिया संदेह के घेरे में, उठे सवाल*

>>सीयूएसबी के मास कम्युनिकेशन विभाग में बहाली प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही कथित तौर पर परिणाम हुआ सार्वजनिक*
पटना।दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय गयाजी के जनसंचार एवं मीडिया विभाग में सह प्राध्यापक और सहायक प्राध्यापक चयन प्रक्रिया में बड़े स्तर पर प्रशासनिक अनियमितता की खबरें शैक्षणिक जगत में चर्चा में आ रही है। ज्ञात हो कि पिछले वर्ष 25 अक्टूबर को निकले विज्ञापन में इस विभाग में रिक्त पड़े पदों को लेकर विज्ञापन प्रकाशित कर अभ्यर्थियों से आवेदन 22 नवम्बर तक लिया गया। इसमें ओबीसी वर्ग से एक सह प्राध्यापक और सामान्य वर्ग से एक सहायक प्राध्यापक के साथ आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में एक सहायक प्राध्यापक पद की भर्ती प्रक्रिया संचालित की गई। पिछले 7 महीनों से इस बहाली को ठंडे बस्ते में रखा गया था लेकिन पिछले महीने जुलाई में चयन प्रक्रिया को फिर से शुरू किया गया और इसी महीने के 5 अगस्त 2025 को इस विषय में साक्षात्कार का आयोजन किया गया। अब ये पूरी प्रक्रिया विवादों के जाल में नजर आने लगी है। जब एक शिकायतकर्ता ने नाम नहीं छापने के शर्त पर बताया कि उसने राष्ट्रपति, केंद्रीय शिक्षा मंत्री और यूजीसी को मेल करके इस चयन प्रक्रिया पर जांच की मांग की है। इसमें उन्होंने कहा है कि ईडब्ल्यूएस वर्ग में सहायक प्राध्यापक पद पर वैसे भी अभ्यर्थियों को शामिल किया गया जिनका मास कम्युनिकेशन विषय में न पीएचडी है और न ही नेट है और वो गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय से सेंटर फॉर डायस्पोरा स्टडीज में पीएचडी धारक है।जबकि उक्त विश्वविद्यालय में मास कम्युनिकेशन विभाग तक स्थापित नहीं है। ऐसे में यह सवाल बनता है कि किस कारणवश ऐसे आवेदकों को भर्ती प्रक्रिया में स्क्रूटिनी के बाद शामिल किया गया।जबकि विज्ञापन में मास कम्युनिकेशन विषय में ही आवेदकों को न्यूनतम अर्हता के रूप में मान्यता दी गई थी। साथ ही इस पूरे प्रक्रिया में स्क्रूटनी और साक्षात्कार में शामिल रहे प्राध्यापकों पर भी जांच करने की मांग उक्त शिकायतकर्ता ने की है। साथ ही इसमें आरोप लगाया गया है कि आधिकारिक तौर पर परिणाम घोषित हुए बगैर ही सभी पदों पर चयनित अभ्यर्थियों के नाम की सूचना सार्वजनिक हो जाना बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े की ओर इंगित करता है। शिकायतकर्ता ने दावा किया है की ओबीसी वर्ग में सह प्राध्यापक के रूप में डॉ. अनिंद्य देब, सामान्य वर्ग में डॉ नेहा निगम और ईडब्ल्यूएस वर्ग में डॉ. अनुज कुमार सिंह के साथ एक विभागीय सहायक प्राध्यापक की प्रोन्नति सह प्राध्यापक के रूप में होने की बात परिणाम से पूर्व ही सामने आ ग़ई है, जिससे इस गोपनीय प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगा दिया है। इस मामले पर शिकायतकर्ता ने सूचना के अधिकार के तहत विश्वविद्यालय से सूचना मांगने का आवेदन सौंपा है ताकि इस मामले पर आधिकारिक सूचना प्राप्त हो सकें। इसके बाद कानूनी प्रावधानों के तहत इस चयन प्रक्रिया पर रोक लगाने और स्क्रूटनी से लेकर साक्षात्कार में शामिल सभी प्रोफेसर की भूमिका की जांच के लिए माननीय न्यायालय का रुख किया जा सकें।
सूत्रों के अनुसार स्क्रूटनी प्रक्रिया में प्रो. ओपी सिंह, प्रो. अनुराग दवे, प्रो. के शिव शंकर शामिल रहें हैं। साथ ही साक्षात्कार प्रक्रिया में प्रो. शंभूनाथ सिंह, प्रो. देवब्रत सिंह, प्रो. मनुकोंडा, प्रो. के. शिव शंकर और दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो कामेश्वर नाथ सिंह भी शामिल रहें हैं।
देखना यह होगा कि विश्वविद्यालय ऐसे शिकायत पर चुप्पी साध लेता है या चयन प्रक्रिया में हो रही अनियमितता पर जांच कमिटी बनाने की कवायद करता है। क्योंकि इस चयन प्रक्रिया में बहुत सारी अन्य शिकायतें भी अन्य अभ्यर्थियों ने की है।जिनमें अनुभव प्रमाण पत्र के बावजूद स्क्रूटनी में एपीआई स्कोर में नंबर नहीं जोड़ा जाना और बेवसाइट पर दो लिएन पदों पर गए सहायक प्राध्यापक के पद में से केवल एक रिक्ति को ही लिएन घोषित करना भी अभ्यर्थियों के बीच प्रश्न बना हुआ है।क्योंकि दूसरे सामान्य वर्ग में कथित तौर पर नियुक्ति पाने वाली महिला अभ्यर्थी पद छोड़कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नियुक्ति पाए एक पूर्व सहायक प्राध्यापक की पत्नी के रूप में चिन्हित किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी मुदस्सर आलम से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी का हवाला देकर जब उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई तो उनसे संपर्क नही हो सका।
बहरहाल ये देखना है कि विज्ञापन में जहां इस पद हेतु न्यूनतम अर्हता नेट और पीएचडी मास कम्युनिकेशन को बनाया गया है और अच्छी खासी संख्या में मास कम्युनिकेशन के अभ्यर्थी भी इस चयन प्रक्रिया में शामिल रहें तो कथित तौर पर किसी अन्य विषय से पीएचडी किए अभ्यर्थी का परिणाम क्यों प्रचारित हो रहा है। साथ ही सहायक प्राध्यापक के पद को खाली कर गए शिक्षक की पत्नी का बहाली से पूर्व नाम बाहर आना भी इस प्रक्रिया पर संदेह पैदा करता है।

