BIHAR : समय के बदलते परिवेश के साथ झूलनोत्सव की परंपरा हो गई खत्म
भागलपुर। सावन माह के अंतिम दिनों में मनाया जाने वाला 5 दिवसीय त्योहार झूलनोत्सव का पूरे उत्तर भारत में काफी महत्व रहा है और यहां के लोग बड़े ही भावपूर्ण तरीके से इस उत्सव का आयोजन करते हैं। भागलपुर में एक जमाने में मंदिरों व ठाकुरबाड़ियों में इस त्यौहार को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता था। भागलपुर मुख्य शहर की जगह-जगह झूलन की बड़ी-बड़ी सजावटें और प्रदर्शनियां लगती थी और इस मौके पर मंदिरों व ठाकुरबाड़ियों में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते थे, जिसे देखने के लिए लोगों का रैला शाम होते ही घर से निकल पड़ता था, जो एक मेला के रुप में तब्दील हो जाया करता था। देर रात लोग अपने घरों तक इस मेले का लुत्फ उठाते हुए पहुंचते थे। भागलपुर के लोगों को पूर्व से ही इस मेला का इंतजार करना पड़ता था कि वे मेले का आयोजन देखेंगे और उसका आनंद लेंगे। असल में शहर के आरपी रोड स्थित खलीफाबाग के गोपाल साह ठाकुरबाड़ी, बाबा बुढ़ानाथ मंदिर, मारवाड़ी टोला के रानी सती व खाटू श्याम मंदिर, कोतवाली चौंक के बाबा कुपेश्वरनाथ मंदिर और डीएन सिंह रोड के बाबा दुग्धेश्वरनाथ मंदिर एवं नाथनगर के मनसकामना नाथ मंदिर आदि इलाकों में इस झूलनोत्सव का मेला बहुत ही बड़े पैमाने पर लगाया जाता रहा है और इसकी सजावटें भी बड़ी आकर्षक होती थीं।
गौरतलब हो कि इससे पूर्व पांच दिनों तक इन स्थलों में जीवंत प्रस्तुतियां हुआ करती थी। दरअसल में भागलपुर की एक सांस्कृतिक पहचान झूलनोत्सव भी हुआ करती थी, लेकिन धीरे-धीरे यह परंपरा खत्म हो गई। कई बार झूलनोत्सव मेला में आपराधिक गतिविधियां भी तेजी से हुई। एक बार अचानक पूरे शहर की बिजली गुल हो गई और पूरे शहर में जहां-जहां लोग घूम रहे थे, अपराधियों ने एक साथ लोगों की चैन-घड़ियां व पर्स आदि छीन लिए और उनके साथ कई तरह की आपराधिक बदसलूकी की गई थी। उसके बाद लोग जागृत हो गए और बड़ी सावधानी से इस तरह के मेले में आने-जाने लगे और धीरे-धीरे इस मेले की यह परंपरा खत्म हो गई। अब तो छोटे-मोटे गलियों में छोटे-छोटे बच्चे आयोजन करते हैं, वह भी शेष रह गया है। वैसे भी पूर्व में जहां-जहां झुलनोत्सव हुआ करता था, वहां आज या तो बड़ी बड़ी अट्टालिकाएं और मॉल और बड़े-बड़े मार्केट बन गए हैं। ऐसे में झूलनोत्सव का मरना लाजमी है। अब तो मंदिरों और ठाकुरबाड़ियों में वहां के पंडित या पुरोहित ही अकेले इस झूलनोत्सव के मौके पर राधा-कृष्ण को झूले पर बिठाकर अकेले ही झुलाते नजर आते हैं।


