भोजशाला विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट के फैसले को मुस्लिम पक्ष ने दी चुनौती
- हाईकोर्ट ने भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर माना, नमाज की अनुमति वाला आदेश किया रद्द
- 721 वर्षों बाद शुक्रवार को हुई मां वाग्देवी की विशेष आरती, धार में उत्सव जैसा माहौल
भोपाल। मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर कानूनी और धार्मिक विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले को अब सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। काजी मोइनुद्दीन ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की है। दूसरी ओर, उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भोजशाला परिसर में पहली बार शुक्रवार के दिन मां वाग्देवी की महाआरती और विशेष पूजन का आयोजन किया गया, जिससे पूरे धार क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला। दरअसल, 15 मई को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि भोजशाला परिसर का धार्मिक स्वरूप मंदिर का है। न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि यह स्थल एक संरक्षित स्मारक होने के साथ-साथ मां सरस्वती का मंदिर भी है। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐतिहासिक साहित्य और पुरातात्विक साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि भोजशाला कभी संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वर्ष 2003 के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया था, जिसके तहत मुस्लिम पक्ष को परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा था कि यदि मुस्लिम पक्ष चाहे तो मस्जिद निर्माण के लिए राज्य सरकार से वैकल्पिक भूमि की मांग कर सकता है। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि उसने सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या मामले में तय किए गए सिद्धांतों के आधार पर साक्ष्यों का परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला है। अदालत ने केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को मंदिर के प्रशासन और प्रबंधन को लेकर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया था। हालांकि परिसर की समग्र देखरेख और संरक्षण की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास ही बनी रहेगी। हिंदू पक्ष लंबे समय से यह मांग कर रहा था कि भोजशाला परिसर हिंदुओं को सौंपा जाए और वहां नमाज पर रोक लगाई जाए। इसी संबंध में कई याचिकाएं दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में वर्ष 2003 की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी गई थी और हिंदू पक्ष के पूजा अधिकार सीमित कर दिए गए थे। विवाद के बीच शुक्रवार को भोजशाला परिसर में पहली बार मां वाग्देवी की महाआरती और विशेष पूजन का आयोजन किया गया। बताया जा रहा है कि लगभग 721 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद ऐसा पहली बार हुआ, जब शुक्रवार के दिन भोजशाला परिसर मां वाग्देवी के जयकारों से गूंज उठा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु भोजशाला पहुंचे और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। पूरे धार अंचल में इसे लेकर धार्मिक उत्साह और खुशी का माहौल देखने को मिला। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में उस मांग पर भी टिप्पणी की थी, जिसमें ब्रिटिश शासनकाल के दौरान लंदन ले जाई गई मां सरस्वती की प्रतिमा को वापस भारत लाने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा था कि केंद्र सरकार इस मांग पर एक औपचारिक प्रतिनिधित्व के रूप में विचार कर सकती है। इस पूरे मामले में वर्ष 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा कराए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उच्च न्यायालय के आदेश पर किए गए इस सर्वेक्षण में कहा गया था कि वर्तमान संरचना पुराने मंदिरों के अवशेषों और हिस्सों से निर्मित प्रतीत होती है। रिपोर्ट में कई ऐसे पुरातात्विक संकेतों का उल्लेख किया गया था, जिन्हें हिंदू पक्ष ने मंदिर होने के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया। सर्वेक्षण रिपोर्ट आने के बाद उच्च न्यायालय ने स्वयं स्थल का निरीक्षण भी किया था। इसके बाद सभी पक्षों की दलीलें सुनने के पश्चात न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया। अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है, जहां आने वाले समय में इस विवाद पर आगे की सुनवाई होगी। भोजशाला विवाद लंबे समय से मध्य प्रदेश की राजनीति और धार्मिक बहस का प्रमुख विषय रहा है। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद जहां हिंदू संगठनों में उत्साह का माहौल है, वहीं मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया है। अब देशभर की नजर सर्वोच्च न्यायालय की आगामी सुनवाई पर टिकी हुई है।


