प्रधानमंत्री की सात अपीलों पर सियासी घमासान, राहुल गांधी ने सरकार को घेरा

  • पेट्रोल बचाने, घर से काम करने और सोना कम खरीदने की अपील पर विपक्ष का हमला
  • कांग्रेस ने कहा- यह सलाह नहीं, सरकार की नीतिगत विफलता का संकेत

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से की गई सात प्रमुख अपीलों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। प्रधानमंत्री ने लोगों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, घर से काम करने, विदेश यात्राओं को सीमित करने और सोने की खरीद घटाने जैसी अपीलें की थीं। इन सुझावों को जहां एक वर्ग ने देशहित में आवश्यक कदम बताया है, वहीं विपक्ष ने इसे सरकार की आर्थिक और प्रशासनिक विफलता का संकेत करार दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में तेलंगाना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान देश की जनता से संसाधनों के सीमित उपयोग और स्वदेशी को बढ़ावा देने की अपील की थी। उन्होंने लोगों से कहा था कि जहां तक संभव हो, घर से काम करने की व्यवस्था को प्राथमिकता दें। इसके अलावा उन्होंने सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करने, पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने और विदेश यात्रा के बजाय देश के भीतर पर्यटन को बढ़ावा देने की सलाह दी थी। प्रधानमंत्री ने लोगों से यह भी कहा था कि अगले एक वर्ष तक सोने की खरीद कम करें या संभव हो तो उसे टाल दें। किसानों से रासायनिक उर्वरकों के सीमित उपयोग की अपील करते हुए उन्होंने प्राकृतिक और संतुलित खेती की ओर ध्यान देने की बात कही थी। प्रधानमंत्री की इन अपीलों के बाद विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला शुरू कर दिया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सामाजिक माध्यम पर पोस्ट करते हुए कहा कि यह अपीलें नहीं, बल्कि सरकार की नाकामी के प्रमाण हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि 12 वर्षों के शासन के बाद देश ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां सरकार लोगों को यह बताने पर मजबूर है कि उन्हें क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं। राहुल गांधी ने लिखा कि प्रधानमंत्री जनता से त्याग मांग रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोगों से सोना नहीं खरीदने, विदेश नहीं जाने, पेट्रोल कम खर्च करने और खाद का कम उपयोग करने की अपील की जा रही है। राहुल गांधी के अनुसार यह स्थिति सरकार की नीतिगत विफलता को दर्शाती है। उन्होंने आगे कहा कि सरकार हर बार अपनी जिम्मेदारी जनता पर डाल देती है, ताकि स्वयं जवाबदेही से बच सके। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि देश को चलाना अब ऐसी सरकार के लिए मुश्किल होता जा रहा है, जो जनता की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने भी प्रधानमंत्री की अपीलों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार को संसद का विशेष सत्र बुलाकर देश को यह बताना चाहिए कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई है, जिसके कारण लोगों से इस प्रकार की अपीलें करनी पड़ रही हैं। कार्ति चिदंबरम ने कहा कि देश को भरोसे में लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। उन्होंने आरोप लगाया कि अचानक इस तरह की घोषणाएं करना उचित नहीं है और सरकार को स्पष्ट रूप से आर्थिक और सामाजिक स्थिति की जानकारी जनता के सामने रखनी चाहिए। वहीं भारतीय जनता पार्टी और सरकार के समर्थकों का कहना है कि प्रधानमंत्री की अपीलें देशहित में हैं और संसाधनों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई हैं। समर्थकों के अनुसार वैश्विक परिस्थितियों, ऊर्जा संकट और बढ़ती आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए नागरिकों की भागीदारी आवश्यक है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री की अपीलों ने देश में आर्थिक नीतियों, ऊर्जा खपत और आम लोगों की जीवनशैली को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। एक ओर सरकार आत्मनिर्भरता और संसाधनों के संरक्षण पर जोर दे रही है, वहीं विपक्ष इसे प्रशासनिक असफलता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा संरक्षण, सार्वजनिक परिवहन और घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देना लंबे समय में देश के लिए लाभकारी हो सकता है। हालांकि इस प्रकार की अपीलों के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी व्यापक होते हैं। फिलहाल प्रधानमंत्री की इन सात अपीलों को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है। आने वाले दिनों में संसद और राजनीतिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर और तीखी बहस होने की संभावना जताई जा रही है।

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