बेड के अभाव में नवजात की मौत, पटना के बड़े अस्पतालों की व्यवस्था पर उठे सवाल

  • एम्स और पीएमसीएच में नहीं मिला इलाज, परिवार दर-दर भटकता रहा
  • निजी अस्पताल में भारी खर्च के बाद भी नहीं बची जान, स्वास्थ्य व्यवस्था पर चिंता

पटना। बिहार की राजधानी पटना में स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियां एक बार फिर सामने आई हैं। पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में बेड नहीं मिलने के कारण तीन दिन के नवजात की मौत हो जाने का आरोप लगा है। परिजनों का कहना है कि समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण बच्चे की जान चली गई, जबकि वे लगातार अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे। मृतक नवजात का जन्म 30 मार्च को लखीसराय सदर अस्पताल में हुआ था। जन्म के लगभग 24 घंटे बाद ही बच्चे की तबीयत बिगड़ने लगी, जिसके बाद वहां के डॉक्टरों ने उसे बेहतर इलाज के लिए पटना रेफर कर दिया। परिजन बच्चे को वेंटिलेटर युक्त एम्बुलेंस से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान पटना लेकर पहुंचे, लेकिन वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी। परिजनों के अनुसार, एम्स में बेड उपलब्ध नहीं होने के कारण बच्चे को भर्ती नहीं किया गया। इसके बाद वे 1 अप्रैल की सुबह करीब पांच बजे पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंचे, लेकिन वहां भी स्थिति अलग नहीं थी। शिशु रोग विभाग में बेड नहीं होने का हवाला देकर बच्चे को भर्ती करने से मना कर दिया गया। नवजात की मौसी रेखा कुमारी ने बताया कि बच्चे की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी और वे घंटों तक अस्पताल में गुहार लगाते रहे, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। उन्होंने आरोप लगाया कि डॉक्टरों ने मानवीय संवेदनशीलता नहीं दिखाई और परिवार को इधर-उधर भटकने के लिए मजबूर कर दिया। थक-हार कर परिजन एक निजी अस्पताल पहुंचे, जहां इलाज शुरू किया गया। हालांकि, वहां केवल दो घंटे के भीतर 51 हजार रुपये का बिल बन गया। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए यह राशि जुटाना मुश्किल हो गया। परिजनों के अनुसार, उन्होंने पुलिस की सहायता ली, जिसके बाद किसी तरह 15 हजार रुपये में मामला सुलझाया गया। इस बीच नवजात की हालत और बिगड़ती चली गई। अंततः निराश होकर मां काजल कुमारी अपने बच्चे को लेकर वापस लखीसराय लौटने लगीं। गांव पहुंचते ही बच्चे ने दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद परिवार में शोक का माहौल है और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गहरा आक्रोश भी देखने को मिल रहा है। यह कोई पहला मामला नहीं है जब पटना के बड़े सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हों। इससे पहले भी कई बार मरीजों को बेड नहीं मिलने, इलाज में देरी और रेफर के नाम पर भटकाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। खासकर गंभीर मरीजों के मामले में इस तरह की लापरवाही चिंताजनक मानी जा रही है। इस मामले में पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के अधीक्षक राजीव कुमार सिंह ने सफाई देते हुए कहा कि अस्पताल में नवजातों के लिए नवजात गहन चिकित्सा इकाई और बाल गहन चिकित्सा इकाई मिलाकर कुल 58 बेड उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि पहले चरण में इतनी ही व्यवस्था है, लेकिन आने वाले समय में दूसरे चरण में बेड की संख्या बढ़ाने की योजना है। अधीक्षक ने यह भी दावा किया कि अन्य सरकारी अस्पतालों की तुलना में पीएमसीएच में नवजातों के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हैं और इसे और प्रभावी बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, इस घटना ने इन दावों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती आबादी और मरीजों की संख्या के अनुपात में अस्पतालों में संसाधनों की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। समय रहते यदि इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी घटनाएं आगे भी सामने आती रहेंगी। नवजात की मौत की यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती है और यह संकेत देती है कि सरकारी अस्पतालों में संसाधनों और प्रबंधन दोनों स्तर पर सुधार की सख्त आवश्यकता है।

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