नीतीश कुमार चौथी बार जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, निर्विरोध चयन

  • नाम वापसी की समयसीमा खत्म होने के बाद हुआ औपचारिक चयन, पार्टी दफ्तर में होगा ऐलान
  • संगठन को एकजुट रखने और राष्ट्रीय विस्तार की रणनीति, 29 मार्च को पटना में अहम बैठक

नई दिल्ली/पटना। जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए हैं। नामांकन वापसी की समयसीमा समाप्त होने के बाद वे निर्विरोध इस पद पर निर्वाचित हुए। दोपहर 2 बजकर 30 मिनट पर नई दिल्ली स्थित पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय में उनके चयन की औपचारिक घोषणा की जाएगी, जिसमें पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहेंगे। नीतीश कुमार ने 19 मार्च को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल किया था। यह नामांकन पार्टी के केंद्रीय कार्यालय, जंतर मंतर रोड, नई दिल्ली में हुआ था। उनके नामांकन पत्र को पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने चुनाव अधिकारी अनिल हेगड़े को सौंपा था। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में यह नीतीश कुमार का चौथा कार्यकाल होगा। इससे पहले उन्होंने वर्ष 2016 में शरद यादव की जगह पार्टी की कमान संभाली थी। इसके बाद वर्ष 2019 में भी वे निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए। वर्ष 2020 में उन्होंने यह जिम्मेदारी आरसीपी सिंह को सौंपी थी, जबकि बाद में ललन सिंह को अध्यक्ष बनाया गया। वर्ष 2023 में ललन सिंह के इस्तीफे के बाद नीतीश कुमार ने पुनः यह पद संभाला और अब लगातार इस पद पर बने हुए हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, जदयू की राष्ट्रीय परिषद और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक 29 मार्च को पटना में आयोजित की जाएगी। इस बैठक में देशभर से पार्टी के प्रतिनिधि भाग लेंगे और संगठनात्मक मुद्दों के साथ-साथ आगामी राजनीतिक रणनीतियों पर चर्चा होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जदयू में नीतीश कुमार ही सबसे प्रभावशाली और सर्वमान्य चेहरा हैं। पार्टी के भीतर ऐसा कोई अन्य नेता नहीं उभर पाया है, जो व्यापक स्तर पर संगठन को एकजुट रख सके। यही कारण है कि पार्टी नेतृत्व ने एक बार फिर नीतीश कुमार को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी है। विश्लेषकों के अनुसार, जदयू के भीतर गुटबाजी और असंतोष की खबरों के बीच यह फैसला संगठन को एकजुट बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में पार्टी को स्थिरता मिलती रही है और उनके नाम पर कार्यकर्ता और विधायक एकजुट रहते हैं। यह भी माना जा रहा है कि जदयू उन्हें एक राष्ट्रीय चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहती है, ताकि बिहार के बाहर भी पार्टी का विस्तार किया जा सके। पार्टी की रणनीति है कि आगामी वर्षों में अन्य राज्यों में भी अपनी उपस्थिति मजबूत की जाए और राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव बढ़ाया जाए। भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन की राजनीति को भी इस फैसले से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार में नीतीश कुमार के साथ एक बड़ा वोट बैंक जुड़ा हुआ है, जो जदयू के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में पार्टी और उसके सहयोगी दल चाहते हैं कि यह वोट बैंक बना रहे और उसमें किसी प्रकार का बिखराव न हो। नीतीश कुमार ने पिछले वर्षों में संगठनात्मक स्तर पर भी कई बदलाव किए हैं। वर्ष 2024 में उन्होंने राष्ट्रीय कार्यकारिणी का पुनर्गठन करते हुए पदाधिकारियों की संख्या कम की और संगठन को अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश की। राष्ट्रीय महासचिवों की संख्या 22 से घटाकर 11 कर दी गई थी। इसके साथ ही उन्होंने सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए अति पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय को संगठन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया। इससे पार्टी के कोर वोट बैंक को मजबूत करने में मदद मिली। पार्टी के भीतर अनुशासन बनाए रखने के लिए भी नीतीश कुमार सख्त रुख अपनाते रहे हैं। हाल के महीनों में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल कुछ नेताओं के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है नीतीश कुमार का एक बार फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना जदयू के लिए संगठनात्मक स्थिरता और राजनीतिक रणनीति दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब 29 मार्च को होने वाली बैठक में पार्टी के भविष्य की दिशा तय होने की उम्मीद है।

You may have missed