कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल, भारत में फिलहाल पेट्रोल-डीजल दरें स्थिर
- खाड़ी क्षेत्र में तनाव के बाद तेल 136 डॉलर प्रति बैरल के पार, कंपनियों के मुनाफे पर असर
- चुनाव और राजकोषीय संतुलन के चलते कीमतों में बढ़ोतरी टली, अर्थव्यवस्था पर बढ़ी चिंता
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत की ऊर्जा व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा दिया है। खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनने के बाद भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल की लागत में लगभग 93 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमत 136.56 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जिससे देश की प्रमुख तेल कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुनाफे पर सीधा असर पड़ा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में इस भारी उछाल के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है। राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 94 रुपये 72 पैसे और डीजल 87 रुपये 62 पैसे प्रति लीटर पर स्थिर बना हुआ है। मुंबई सहित अन्य महानगरों में भी कीमतों में स्थिरता बनी हुई है। माना जा रहा है कि यह स्थिति कुछ समय तक बनी रह सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार फिलहाल कीमतों में बदलाव से बचना चाहती है ताकि वित्तीय संतुलन बना रहे। 31 मार्च तक करों या कीमतों में किसी बदलाव की संभावना नहीं जताई जा रही है। इसके अलावा आगामी चुनावों को देखते हुए भी पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने से परहेज किया जा रहा है। 29 अप्रैल तक अंतिम चरण के मतदान के चलते कीमतों में वृद्धि की संभावना कम मानी जा रही है। दूसरी ओर, अमेरिका सहित कई देशों ने कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के अनुरूप अपने यहां खुदरा ईंधन कीमतों में वृद्धि कर दी है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमत लगभग 3.7 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है। इसके विपरीत भारत में तेल कंपनियां अपने लाभांश में कमी झेलते हुए कीमतों को स्थिर बनाए हुए हैं। आंकड़ों के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से वैश्विक मानक ब्रेंट क्रूड में 40 प्रतिशत से अधिक और रूसी यूराल कच्चे तेल में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। 26 फरवरी को भारतीय कच्चे तेल टोकरी की कीमत 70.9 डॉलर प्रति बैरल थी, जो 12 मार्च को बढ़कर 127.2 डॉलर और शुक्रवार को 136.5 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इस संकट का प्रमुख कारण ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध किया जाना बताया जा रहा है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। भारत के लिए स्थिति और भी गंभीर है, क्योंकि देश की कुल ऊर्जा आपूर्ति का करीब 60 प्रतिशत इसी मार्ग से आता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी द्वारा आपातकालीन भंडार से 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने के फैसले के बाद कुछ समय के लिए कीमतों में हल्की राहत मिली थी, लेकिन जहाजों की आवाजाही सामान्य नहीं होने के कारण बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। आर्थिक विशेषज्ञों ने इस स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है और व्यापार संतुलन पर नकारात्मक असर पड़ेगा। इससे देश के चालू खाता घाटे में भी वृद्धि हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से वैश्विक विकास दर पर असर पड़ सकता है और मुद्रास्फीति बढ़ने की संभावना है। ऐसे में आने वाले समय में ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों पर इस संकट के गहरे प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।


