संजय राउत का बड़ा बयान, कहा- लोकसभा के समय ही जगाता है इंडिया गठबंधन, राज्यों में चुनाव से कोई मतलब नहीं
नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 240 सीटों पर रोकने के बाद उत्साह से भरे विपक्षी इंडिया गठबंधन के भीतर अब मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। हाल के महीनों में अलग-अलग राज्यों में हुए चुनावों में मिली हार और आपसी समन्वय की कमी ने गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी बीच शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने गठबंधन की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए बड़ा बयान दिया है।
लोकसभा तक ही सीमित रहता है गठबंधन
संजय राउत ने साफ शब्दों में कहा कि इंडिया गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के समय ही सक्रिय नजर आता है। उनके अनुसार आम चुनाव नजदीक आते ही गठबंधन में हलचल शुरू होती है, लेकिन उसके बाद लंबे समय तक कोई संवाद नहीं होता। राउत ने कहा कि चुनाव से पहले तक कई दलों को यह तक पता नहीं होता कि गठबंधन के भीतर चल क्या रहा है। यह स्थिति विपक्ष की सामूहिक रणनीति को कमजोर करती है।
राज्यों के चुनावों में बिखराव
बीते समय में हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में चुनावी हार ने इंडिया गठबंधन की स्थिति को और कमजोर किया है। महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में भी गठबंधन को करारा झटका लगा, जिससे अंदरूनी असंतोष बढ़ा है। राउत का मानना है कि यदि गठबंधन राज्यों के चुनावों में भी उसी गंभीरता से काम करता, जैसी तैयारी लोकसभा चुनाव के समय दिखती है, तो नतीजे अलग हो सकते थे।
सिर्फ संसद पर निर्भरता पर सवाल
संजय राउत ने यह भी कहा कि केवल संसद में हंगामा करना या मुद्दे उठाना ही काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्षी नेताओं को कई बार संसद में बोलने तक का मौका नहीं मिलता। ऐसे में सवाल उठता है कि सिर्फ सदन के भीतर रहकर जनता की समस्याओं पर कितना दबाव बनाया जा सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि राहुल गांधी को भी संसद में बोलने से रोका जाता है, तो फिर विपक्ष के पास क्या विकल्प बचता है।
सड़क से सदन तक संघर्ष की जरूरत
राउत ने कहा कि गठबंधन को हर वक्त सक्रिय रहना चाहिए, चाहे चुनाव हों या नहीं। किसान आंदोलन, कानून व्यवस्था, मणिपुर के हालात जैसे गंभीर मुद्दों पर विपक्ष को सड़क से लेकर संसद तक समन्वित प्रयास करने होंगे। उनका कहना था कि यदि गठबंधन केवल चुनाव से पहले जागेगा, तो जनता के बीच भरोसा नहीं बन पाएगा।
अर्थव्यवस्था और किसानों पर चिंता
अपने बयान में संजय राउत ने देश की आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ होने वाली डील का असर किसानों पर पड़ सकता है। उनका दावा था कि यदि सही तरीके से इन मुद्दों को नहीं उठाया गया, तो किसानों की आत्महत्या और भुखमरी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। राउत ने कहा कि इन गंभीर विषयों को यदि सिर्फ संसद तक सीमित रखा गया, तो समाधान संभव नहीं होगा।
नेतृत्व को लेकर उठते सवाल
गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर भी चर्चा तेज होती जा रही है। जब संजय राउत से इस विषय पर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि हर किसी की अपनी राय हो सकती है। कुछ लोग ममता बनर्जी या एम के स्टालिन को नेतृत्व देने की बात कर सकते हैं, लेकिन यह उनकी व्यक्तिगत राय है। राउत के अनुसार किसी भी फैसले से पहले गठबंधन की बैठक होना जरूरी है, जिसमें सभी दल अपनी बात रख सकें।
बैठक और संवाद की कमी
राउत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कई बार महीनों और सालों तक गठबंधन के दल आपस में बातचीत नहीं करते। उन्होंने कहा कि उद्धव ठाकरे हों या अन्य नेता, सभी चाहते हैं कि इंडिया गठबंधन हर समय सक्रिय रहे। संवादहीनता के कारण ही रणनीतिक फैसले समय पर नहीं हो पाते और इसका खामियाजा चुनावी नतीजों में भुगतना पड़ता है।
आगामी चुनावों की चुनौती
इस साल चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव होने हैं, जिनमें पश्चिम बंगाल और असम जैसे बड़े राज्य भी शामिल हैं। इन चुनावों को इंडिया गठबंधन के लिए अग्निपरीक्षा माना जा रहा है। चुनाव आयोग की ओर से जल्द ही चुनाव की तारीखों की घोषणा की जा सकती है। ऐसे में विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह आपसी मतभेद भुलाकर साझा रणनीति तैयार करे।
विपक्ष की दिशा और भविष्य
संजय राउत के बयान को विपक्ष के भीतर बढ़ती बेचैनी के रूप में देखा जा रहा है। यह बयान संकेत देता है कि इंडिया गठबंधन को यदि लंबे समय तक प्रभावी बने रहना है, तो उसे सिर्फ चुनावी गठजोड़ से आगे बढ़कर एक निरंतर सक्रिय राजनीतिक मंच बनना होगा। जनता के मुद्दों पर साझा आंदोलन, नियमित बैठकें और स्पष्ट नेतृत्व संरचना ही गठबंधन को मजबूती दे सकती है। संजय राउत की टिप्पणी ने इंडिया गठबंधन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले चुनावों से पहले यह देखना अहम होगा कि विपक्ष इन सवालों को आत्ममंथन के रूप में लेता है या फिर अंदरूनी खींचतान और बढ़ती है।


