यूजीसी बिल के समर्थन में उतरे विकास दिव्यकीर्ति, कहा- नियमों में भेदभाव, कुछ बिंदुओं में बदलाव की संभावना
नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों को लेकर देशभर में जहां विरोध और समर्थन की सियासत तेज है, वहीं इस बहस में अब चर्चित शिक्षाविद् और शिक्षक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति भी खुलकर सामने आ गए हैं। उन्होंने यूजीसी के नए नियमों का समर्थन करते हुए इन्हें जरूरी और पहले से बेहतर बताया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि इन नियमों में भेदभाव की भावना नहीं हो सकती, क्योंकि भेदभाव कोई सोच या भावना नहीं, बल्कि एक ठोस कृत्य होता है।
नए नियमों को बताया 2012 से बेहतर
डॉ. विकास दिव्यकीर्ति ने यूजीसी के नए विनियमों पर अपनी राय रखते हुए कहा कि कुल मिलाकर ये नियम सकारात्मक हैं। उन्होंने कहा कि यदि कुछ बिंदुओं को छोड़ दिया जाए तो नए नियमों में कोई बड़ी खामी नहीं है। उनके मुताबिक, वर्ष 2012 में लागू भेदभाव-विरोधी ढांचे की तुलना में 2026 के नियम ज्यादा स्पष्ट और प्रभावी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए ऐसे नियमों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
भेदभाव पर उठ रहे सवालों पर प्रतिक्रिया
नए नियमों को लेकर एक बड़ा आरोप यह लगाया जा रहा है कि इनमें कुछ वर्गों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. दिव्यकीर्ति ने साफ शब्दों में कहा कि भेदभाव कोई भावना नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि अगर भेदभाव होता है तो वह किसी ठोस कार्रवाई के रूप में सामने आता है। केवल यह सोच लेना कि इससे भेदभाव हो सकता है, अपने आप में भेदभाव साबित नहीं करता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सिर्फ मन में यह आ जाना कि किसी नियम से नुकसान होगा, यह कहने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वह नियम गलत है।
कुछ बिंदुओं में संशोधन की गुंजाइश
हालांकि समर्थन के साथ-साथ डॉ. दिव्यकीर्ति ने यह भी स्वीकार किया कि कुछ बिंदुओं पर सुधार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रावधानों में यह स्पष्ट किया जा सकता है कि समाज के अन्य वर्गों की भूमिका भी इसमें शामिल रहे। उनके अनुसार, यह संशोधन बहुत छोटा है और केवल दो पंक्तियों में इसे ठीक किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि नियम बनाने वालों का उद्देश्य किसी भी वर्ग को बाहर करना नहीं रहा होगा।
सरकार की मंशा पर उठे सवालों को किया खारिज
डॉ. दिव्यकीर्ति ने उन आरोपों को भी खारिज किया, जिनमें कहा जा रहा है कि नए नियमों से सामान्य वर्ग को नुकसान होगा। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान सरकार का प्रमुख आधार ही सामान्य वर्ग माना जाता है, ऐसे में यह कल्पना करना कि सरकार जानबूझकर उसी वर्ग के खिलाफ नियम बनाएगी, तर्कसंगत नहीं लगता। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 2012 के नियमों में भी ऐसी ही बातें थीं, लेकिन उस समय न तो इतना शोर मचा और न ही बड़े स्तर पर विरोध हुआ।
विरोध प्रदर्शनों को बताया अस्वाभाविक
यूजीसी नियमों के खिलाफ देश के कई हिस्सों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर भी डॉ. दिव्यकीर्ति ने सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि उन्हें यह विरोध स्वाभाविक नहीं लगता। उनके अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि कई जगहों पर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के प्राचार्य और कुलपति इस विरोध को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि असल में समस्या नियमों से ज्यादा उनकी अनुपालना को लेकर है। इतने ज्यादा अनुपालन नियमों को संभालना आसान नहीं होता, इसी वजह से कुछ लोग चाहते हैं कि पूरा नियम ही वापस ले लिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला
यूजीसी के नए नियमों को लेकर विवाद अब न्यायिक स्तर तक भी पहुंच गया है। सवर्ण वर्ग को नियमों में शामिल नहीं किए जाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका पर सुनवाई के लिए भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने सहमति जता दी है। माना जा रहा है कि इस सुनवाई के बाद नियमों को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
यूजीसी के नए नियम क्या कहते हैं
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी को ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026’ अधिसूचित किए थे। ये नियम वर्ष 2012 में लागू भेदभाव-विरोधी ढांचे की जगह लाए गए हैं। नए नियमों के तहत उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव सहित सभी प्रकार के भेदभाव से निपटने के लिए एक मजबूत और लागू करने योग्य व्यवस्था बनाई गई है। इसमें शिकायत निवारण, निगरानी तंत्र और जवाबदेही सुनिश्चित करने के प्रावधान शामिल हैं।
बहस के बीच आगे की राह
यूजीसी के नए नियमों को लेकर देश में बहस अभी थमी नहीं है। एक ओर जहां छात्र संगठनों और कुछ सामाजिक वर्गों में असंतोष है, वहीं शिक्षाविदों और विशेषज्ञों का एक वर्ग इन्हें सुधार की दिशा में जरूरी कदम मान रहा है। डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का समर्थन इस बहस को नया मोड़ देता है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और संभावित संशोधनों पर टिकी है, जो आने वाले दिनों में उच्च शिक्षा व्यवस्था की दिशा तय कर सकते हैं।


