February 20, 2026

पटना में दाखिल खारिज के 3.6 लाख मामले रिजेक्ट, कई कागजातों की कमी, विभाग ने भी की सख्ती

पटना। जिले में जमीन से जुड़े मामलों के निपटारे को लेकर सरकार द्वारा किए जा रहे दावों और जमीनी सच्चाई के बीच बड़ा अंतर सामने आ रहा है। दाखिल-खारिज और परिमार्जन प्लस जैसी प्रक्रियाओं के जरिए जमाबंदी सुधारने और भूमि विवाद कम करने की बात कही जा रही है, लेकिन हालिया आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में आवेदन या तो खारिज किए जा रहे हैं या अब भी लंबित हैं। इससे आम नागरिकों की परेशानी कम होने के बजाय कई मामलों में और बढ़ती दिख रही है।
6.37 लाख मामलों का निपटारा, 3.66 लाख रिजेक्ट
ताजा आंकड़ों के अनुसार पटना जिले में दाखिल-खारिज से जुड़े कुल 6.37 लाख आवेदनों का निपटारा किया जा चुका है। हालांकि इनमें से करीब 3.66 लाख आवेदन सीधे तौर पर रिजेक्ट कर दिए गए हैं। यानी कुल निपटाए गए मामलों का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा खारिज हो चुका है। यह आंकड़ा अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि प्रक्रिया में आवेदकों को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
कागजातों की कमी बना सबसे बड़ा कारण
राजस्व विभाग का कहना है कि अधिकांश मामलों में जरूरी दस्तावेज पूरे नहीं होने के कारण आवेदन खारिज किए गए हैं। विभाग के अनुसार जमीन से जुड़े मामलों में पुराने दस्तावेज, वंशावली, लगान रसीद, नक्शा और अन्य प्रमाणों का होना अनिवार्य है। यदि इनमें से कोई कागज नहीं मिलता या दस्तावेजों में तकनीकी खामी होती है, तो आवेदन को मंजूरी देना संभव नहीं होता।
आम लोगों की बढ़ती नाराजगी
वहीं दूसरी ओर आवेदकों का कहना है कि उन्हें बार-बार नई शर्तों और नए कागजातों के नाम पर परेशान किया जा रहा है। कई लोगों का आरोप है कि जब वे एक बार आवेदन करते हैं, तो बाद में उनसे ऐसे दस्तावेज मांगे जाते हैं, जिनके बारे में पहले कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी। पुराने जमीन रिकॉर्ड जुटाना, वंशावली बनवाना और नक्शे की प्रति हासिल करना आम लोगों के लिए आसान नहीं होता। इसी कारण बड़ी संख्या में आवेदन तकनीकी आधार पर खारिज हो रहे हैं।
लंबित मामलों ने भी बढ़ाई चिंता
रिजेक्ट किए गए मामलों के साथ-साथ लंबित आवेदनों की संख्या भी चिंता का विषय बनी हुई है। जिले में अब भी दाखिल-खारिज के 17,242 आवेदन लंबित हैं। इसका मतलब यह है कि हजारों लोग अब भी अपने आवेदन के निपटारे का इंतजार कर रहे हैं। तय समय सीमा में मामलों के निष्पादन के सरकारी दावों के बावजूद लंबित मामलों की यह संख्या प्रक्रिया की सुस्ती को उजागर करती है।
जिलाधिकारी ने की समीक्षा बैठक
स्थिति को देखते हुए जिलाधिकारी डॉ. त्यागराजन एसएम ने हाल ही में सभी डीसीएलआर और अंचल अधिकारियों के साथ राजस्व मामलों की समीक्षा बैठक की। बैठक में उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया कि दाखिल-खारिज और परिमार्जन प्लस से जुड़े सभी आवेदनों का निपटारा निर्धारित समय सीमा के भीतर किया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि बिना ठोस कारण के आवेदन खारिज न किए जाएं और आवेदकों को सही मार्गदर्शन दिया जाए।
निर्देशों के बावजूद बनी हुई हैं दिक्कतें
हालांकि प्रशासनिक स्तर पर लगातार समीक्षा और निर्देश दिए जा रहे हैं, लेकिन आंकड़े यह बताते हैं कि जमीनी स्तर पर समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। कई अंचलों में आवेदकों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। कहीं तकनीकी कारणों से फाइल अटक जाती है, तो कहीं कर्मचारियों की कमी या कार्यभार का हवाला देकर प्रक्रिया टाल दी जाती है।
परिमार्जन प्लस की भूमिका पर सवाल
परिमार्जन प्लस को जमीन रिकॉर्ड में सुधार के लिए एक अहम कदम माना गया था। इसका उद्देश्य था कि गलत जमाबंदी, नाम की त्रुटि या अन्य रिकॉर्ड संबंधी खामियों को ऑनलाइन प्रक्रिया के जरिए ठीक किया जाए। लेकिन जब बड़ी संख्या में आवेदन रिजेक्ट हो रहे हैं, तो इस योजना की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठने लगे हैं। लोग यह पूछ रहे हैं कि यदि ऑनलाइन व्यवस्था के बावजूद कागजातों की जटिलता कम नहीं हो पा रही है, तो इसका वास्तविक लाभ क्या है।
भूमि विवाद कम करने का लक्ष्य अधूरा
दाखिल-खारिज और परिमार्जन प्लस जैसी प्रक्रियाओं का मूल उद्देश्य भूमि विवादों को कम करना है। लेकिन जब आवेदनों का बड़ा हिस्सा खारिज हो जाता है, तो विवाद सुलझने के बजाय और उलझ सकता है। जिन लोगों के आवेदन रिजेक्ट हो जाते हैं, उन्हें दोबारा प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती है या फिर वे कानूनी रास्ता अपनाने को मजबूर होते हैं, जिससे विवाद और लंबा खिंच जाता है।
प्रक्रिया को सरल बनाने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में जमीन से जुड़े विवाद कम करना चाहती है, तो दाखिल-खारिज की प्रक्रिया को और सरल बनाना होगा। आवेदकों को पहले ही यह स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए कि कौन-कौन से दस्तावेज अनिवार्य हैं। साथ ही तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए अंचल स्तर पर मदद केंद्र या मार्गदर्शन व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए।
पारदर्शिता और मार्गदर्शन जरूरी
आवेदकों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उन्हें सही जानकारी समय पर नहीं मिलती। यदि आवेदन रिजेक्ट होता है, तो कारण स्पष्ट रूप से समझाया नहीं जाता। ऐसे में पारदर्शिता बढ़ाने और कारणों को सरल भाषा में बताने की जरूरत है, ताकि लोग अगली बार वही गलती न दोहराएं। पटना में दाखिल-खारिज के 3.66 लाख मामलों का रिजेक्ट होना यह दिखाता है कि व्यवस्था और आम लोगों के बीच अभी भी बड़ा अंतर है। सरकार के प्रयासों के बावजूद प्रक्रिया पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाई है। यदि दस्तावेजी जटिलताओं को कम किया जाए, स्पष्ट मार्गदर्शन दिया जाए और समयबद्ध निपटारे पर सख्ती से अमल हो, तभी दाखिल-खारिज और परिमार्जन प्लस जैसी योजनाएं अपने उद्देश्य को पूरा कर सकेंगी और आम नागरिकों को वास्तविक राहत मिल पाएगी।

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