January 29, 2026

33 साल पुराने अपराधिक मामले में सूरजभान सिंह को 1 साल की सजा, बेगूसराय कोर्ट ने सुनाया फैसला

बेगूसराय। बेगूसराय की अदालत ने 33 साल पुराने एक आपराधिक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इस फैसले में पूर्व सांसद सूरजभान सिंह को एक साल की सजा दी गई है। मामला वर्ष 1991 का है, जब मटिहानी थाने के अंतर्गत पुलिस पर हमला किया गया था। लंबे समय से अदालत में यह केस लंबित था और आखिरकार अब न्यायपालिका ने अपना निर्णय सुना दिया।
सूरजभान सिंह को मिली सजा
पूर्व सांसद सूरजभान सिंह को इस मामले में दोषी पाया गया और उन्हें एक साल की सजा सुनाई गई। अदालत ने साफ कहा कि कानून के सामने सभी बराबर हैं, चाहे वह आम नागरिक हों या जनप्रतिनिधि। इस फैसले ने यह संदेश दिया कि न्याय में देरी भले हो, लेकिन किसी को कानून से ऊपर नहीं माना जाएगा।
अन्य आरोपियों पर कार्रवाई
इसी मामले में भारतीय जनता पार्टी के नेता रामलखन सिंह और एक अन्य आरोपी को अदालत ने चार-चार साल की सजा सुनाई है। इन दोनों पर गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज था, जिनमें पुलिसकर्मियों पर हमला करना और सरकारी कार्य में बाधा डालना शामिल था। अदालत ने सबूतों और गवाहियों के आधार पर इन्हें दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।
मामला क्यों था महत्वपूर्ण
यह केस इसलिए महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि इसमें सीधे तौर पर जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक हस्तियों की संलिप्तता थी। वर्ष 1991 में दर्ज यह मामला दशकों तक अदालत में लंबित रहा, लेकिन न्यायपालिका ने अंततः पीड़ित पक्ष और अभियोजन की दलीलों को स्वीकार करते हुए दोषियों को सजा सुनाई। इस फैसले ने यह साबित कर दिया कि चाहे समय कितना भी लगे, न्याय प्रणाली दोषियों को बख्शती नहीं है।
अभियोजन पक्ष की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद अभियोजन पक्ष ने इसे न्याय की जीत बताया। उनका कहना था कि लंबे इंतजार के बाद भी न्याय मिला है और इससे जनता का विश्वास न्यायपालिका पर और मजबूत होगा। अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि अदालत का यह निर्णय अन्य मामलों में भी मिसाल बनेगा और अपराधियों को यह संदेश देगा कि वे कानून से बच नहीं सकते।
दोषियों की गिरफ्तारी और जेल भेजा जाना
सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद सभी दोषियों को अदालत से सीधे जेल भेज दिया गया। इससे यह संकेत मिला कि अदालत इस मामले में किसी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं थी। अदालत के आदेश का तुरंत पालन किया गया और दोषियों को हिरासत में लेकर जेल प्रशासन को सौंप दिया गया।
राजनीति और न्याय व्यवस्था पर असर
इस फैसले का असर राजनीति पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। सूरजभान सिंह और अन्य दोषियों की सजा ने यह स्पष्ट किया है कि जनप्रतिनिधि भी अगर कानून तोड़ते हैं तो उन्हें सजा मिलेगी। यह निर्णय जनता के लिए भी एक सकारात्मक संदेश है कि राजनीतिक ताकत रखने वाले लोग भी कानून के शिकंजे से बाहर नहीं रह सकते।
न्याय में देरी लेकिन न्याय मिला
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि भले ही न्याय मिलने में देर हो सकती है, लेकिन न्यायपालिका आखिरकार अपना काम करती है। 33 साल बाद आया यह फैसला इस सिद्धांत की पुष्टि करता है कि कानून सबके लिए समान है। जनता लंबे समय से इस फैसले का इंतजार कर रही थी और अब जब अदालत ने दोषियों को सजा दी है तो लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था पर और गहरा होगा। बेगूसराय कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली के लिए एक अहम मील का पत्थर है। यह संदेश साफ तौर पर सामने आया कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं और कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं हो सकता। सूरजभान सिंह को एक साल की सजा और अन्य दो आरोपियों को चार-चार साल की सजा ने यह साबित कर दिया कि न्यायपालिका निष्पक्ष है और अंततः न्याय मिलता है।

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