बिहार कांग्रेस में हो सकती है फूट, पाला बदलेंगे सभी विधायक, जदयू में जाने की तैयारी
पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर तेज हलचल के दौर में प्रवेश करती दिख रही है। राज्य में दलबदल की अटकलें नए सिरे से जोर पकड़ रही हैं और इस बार चर्चा देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को लेकर है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि बिहार कांग्रेस के सभी छह विधायक जल्द ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह न केवल कांग्रेस के लिए बड़ा झटका होगा, बल्कि बिहार विधानसभा की राजनीतिक तस्वीर भी काफी हद तक बदल जाएगी।
कांग्रेस के अस्तित्व पर मंडराता संकट
बिहार विधानसभा में कांग्रेस के पास फिलहाल छह विधायक हैं। यदि ये सभी विधायक पाला बदलते हैं, तो 243 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। यह स्थिति कांग्रेस के लिए ऐतिहासिक रूप से बेहद असहज मानी जा रही है, क्योंकि कभी बिहार की राजनीति में उसकी निर्णायक भूमिका हुआ करती थी। अब हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि पार्टी राज्य की विधानसभा से बाहर हो सकती है।
कौन हैं कांग्रेस के छह विधायक
सूत्रों के हवाले से जिन विधायकों के नाम सामने आ रहे हैं, उनमें मनोहर प्रसाद सिंह, सुरेंद्र प्रसाद, अभिषेक रंजन, आबिदुर रहमान, मोहम्मद कामरुल होदा और मनोज बिस्वान शामिल हैं। बताया जा रहा है कि ये सभी विधायक जदयू नेतृत्व के संपर्क में हैं और पार्टी बदलने को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है। इन विधायकों की हालिया गतिविधियां भी इन अटकलों को मजबूती देती हैं।
पार्टी कार्यक्रमों से दूरी के संकेत
हाल के दिनों में कांग्रेस विधायकों का पार्टी कार्यक्रमों से दूरी बनाना चर्चा का विषय बना हुआ है। पटना स्थित सदाकत आश्रम में आयोजित पारंपरिक दही-चूड़ा भोज में इन छह विधायकों की गैरमौजूदगी ने कई सवाल खड़े किए। इसके अलावा 8 जनवरी को प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम द्वारा बुलाई गई मनरेगा बचाओ अभियान की बैठक में भी ये विधायक शामिल नहीं हुए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दूरी महज संयोग नहीं बल्कि अंदरूनी असंतोष का संकेत है।
जदयू में शामिल होने की संभावनाएं
जदयू के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का दावा है कि कांग्रेस विधायक अपनी पार्टी की कार्यप्रणाली से नाराज हैं और उन्हें जदयू में बेहतर राजनीतिक भविष्य दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नेतृत्व शैली और सत्ता में भागीदारी का अवसर इन विधायकों को आकर्षित कर रहा है। जदयू नेतृत्व की ओर से भी संकेत दिए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकता है।
सदन के गणित पर संभावित असर
विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि जनता दल (यूनाइटेड) को 85 सीटें मिली थीं। कांग्रेस के छह विधायक यदि जदयू में शामिल होते हैं, तो जदयू की संख्या बढ़कर 91 हो जाएगी। ऐसी स्थिति में जदयू सदन में सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी और भाजपा दूसरे स्थान पर खिसक जाएगी। यह बदलाव सत्ता संतुलन और गठबंधन की राजनीति पर गहरा असर डाल सकता है।
भाजपा की रणनीति और राष्ट्रीय लोक मोर्चा
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी भी अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने की कोशिश में जुटी है। भाजपा की नजर उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के असंतुष्ट विधायकों पर है। बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा के चार में से तीन विधायक रामेश्वर महतो, माधव आनंद और आलोक कुमार सिंह भाजपा के संपर्क में हैं। पार्टी के भीतर नाराजगी की वजह उपेंद्र कुशवाहा द्वारा अपने बेटे दीपक को कैबिनेट मंत्री बनाया जाना बताया जा रहा है।
भाजपा नेताओं से मुलाकात और संकेत
हाल ही में इन असंतुष्ट विधायकों ने भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा में टूट संभव है। यदि ये विधायक भाजपा में शामिल होते हैं, तो भाजपा अपनी सीटों की संख्या बढ़ाकर सदन में शीर्ष स्थान बनाए रखने की कोशिश कर सकती है।
आरसीपी सिंह और जन सुराज की भूमिका
बिहार की राजनीति में एक और दिलचस्प पहलू जदयू के पूर्व कद्दावर नेता आरसीपी सिंह से जुड़ा है। आरसीपी सिंह नीतीश कुमार से अलग होकर प्रशांत किशोर की पहल जन सुराज से जुड़े थे। हालांकि अब उनके दोबारा जदयू में लौटने की अटकलें लगाई जा रही हैं। हाल ही में आयोजित एक कुर्मी सम्मेलन में नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह की मौजूदगी को राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
आने वाले दिनों में क्या
कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति एक बार फिर अनिश्चितता और संभावनाओं के दौर से गुजर रही है। यदि कांग्रेस के विधायक जदयू में जाते हैं और राष्ट्रीय लोक मोर्चा में भी टूट होती है, तो विधानसभा का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है। इससे न केवल सत्तारूढ़ गठबंधन बल्कि विपक्षी दलों की रणनीतियों पर भी असर पड़ेगा। फिलहाल सभी की निगाहें आने वाले दिनों पर टिकी हैं, जब यह साफ हो सकेगा कि ये अटकलें हकीकत में बदलती हैं या महज राजनीतिक दबाव की रणनीति बनकर रह जाती हैं।


