February 20, 2026

बच्चों के विवाद में बोला सुप्रीम कोर्ट, कहा- 6 महीने के जुड़वां बच्चों को मां से जुदा करना क्रूरता, पति को लगाई फटकार

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवाद के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि छह माह के जुड़वां बच्चों को उनकी मां से अलग करना क्रूरता की पराकाष्ठा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि छोटे बच्चों का अपनी मां से अलग रहना उनके हितों के खिलाफ है और बच्चों का कल्याण सर्वोपरि होना चाहिए। न्यायालय ने इस मामले में पति को फटकार लगाते हुए अगली सुनवाई की तारीख पर पति-पत्नी को अपने बच्चों के साथ न्यायाधीश के कक्ष में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने की। पीठ ने कहा कि पति द्वारा छह माह के बच्चों को उनकी मां से अलग करना अत्यंत क्रूर और अमानवीय है। न्यायालय ने कहा कि इतने छोटे बच्चों को उनकी मां से वंचित नहीं किया जा सकता और यह न्याय की भावना के विपरीत है। न्यायालय ने यह भी कहा कि बच्चों का हित और उनका मानसिक एवं शारीरिक विकास सबसे महत्वपूर्ण है। यह मामला पति द्वारा दायर एक याचिका से संबंधित है, जिसमें उसने पत्नी द्वारा लखनऊ में दर्ज किए गए वैवाहिक मामलों को पंजाब स्थानांतरित करने की मांग की थी। इस याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने बच्चों की अभिरक्षा और उनके हितों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। पति के वकील ने न्यायालय से अनुरोध किया कि बच्चों की वर्तमान स्थिति में बदलाव न किया जाए, क्योंकि इससे बच्चों को नुकसान हो सकता है। इस पर न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि कोई भी दादी या नानी छह माह के बच्चों की देखभाल उस प्रकार नहीं कर सकती, जैसा उनकी मां कर सकती है। न्यायालय ने कहा कि इतने छोटे बच्चों के लिए मां की उपस्थिति अत्यंत आवश्यक होती है। पति के वकील ने यह भी दावा किया कि पत्नी ने स्वयं घर छोड़ दिया था और बच्चों को अपने पास रखने में रुचि नहीं दिखाई। इस पर न्यायालय ने कहा कि यदि मां को अपने बच्चों की अभिरक्षा में रुचि नहीं होती, तो वह इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय तक नहीं लाती। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि मां द्वारा न्यायालय में लड़ाई लड़ना यह दर्शाता है कि वह अपने बच्चों के प्रति गंभीर और जिम्मेदार है। पत्नी के वकील ने न्यायालय को बताया कि पति शराब का सेवन करता है और वह वीडियो कॉल के माध्यम से भी बच्चों को मां को दिखाने के लिए तैयार नहीं होता है। न्यायालय ने इस पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की और मामले के सभी पहलुओं की जांच करने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी ध्यान दिया कि पत्नी एक शिक्षिका हैं, जबकि पति एक व्यवसायी हैं। न्यायालय ने पति से पूछा कि वह अपनी पत्नी के भरण-पोषण के लिए कितनी राशि देने को तैयार है। न्यायालय ने पति को इस संबंध में लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 26 फरवरी निर्धारित की है और निर्देश दिया है कि उस दिन पति-पत्नी अपने जुड़वां बच्चों, जिनमें एक बेटा और एक बेटी शामिल हैं, के साथ न्यायालय में उपस्थित हों। न्यायालय ने कहा कि वह बच्चों के हित को ध्यान में रखते हुए आगे का निर्णय लेगा। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि छोटे बच्चों के मामलों में न्यायालय का प्राथमिक उद्देश्य उनके हितों की रक्षा करना है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि बच्चों को मां से अलग रखना उनके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए हानिकारक हो सकता है।

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