January 16, 2026

हिंदी साहित्य के प्रख्यात कथाकार ज्ञानरंजन का निधन, 90 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस

नई दिल्ली। हिंदी साहित्य के लिए यह समय अत्यंत शोकपूर्ण है। प्रख्यात कथाकार, चिंतक और साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के संपादक रहे ज्ञानरंजन का बुधवार रात 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने जबलपुर के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर के साथ ही साहित्यिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। वे न केवल एक बड़े कथाकार थे, बल्कि हिंदी साहित्य की वैचारिक और रचनात्मक चेतना के सशक्त प्रतिनिधि भी माने जाते थे।
वृद्धावस्था और अस्वस्थता के बीच अंतिम विदाई
परिवार के करीबी मित्र पंकज स्वामी के अनुसार ज्ञानरंजन लंबे समय से वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे। बुधवार सुबह अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां रात लगभग साढ़े दस बजे उनका निधन हो गया। उनके परिवार में पत्नी सुनयना, पुत्री वत्सला और पुत्र शांतनु हैं। दोनों संतानें जबलपुर में ही रहती हैं। गुरुवार दोपहर जबलपुर के गौरीघाट मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को महाराष्ट्र के अकोला जिले में हुआ था। उनका जीवन बहु-भौगोलिक अनुभवों से समृद्ध रहा। उनका प्रारंभिक जीवन महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे विभिन्न क्षेत्रों में बीता। इन विविध सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभवों का गहरा प्रभाव उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है। यही कारण है कि उनकी कहानियों में केवल किसी एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि व्यापक भारतीय समाज की जटिलताएं और विडंबनाएं दिखाई देती हैं।
शिक्षा और अध्यापन का सफर
उन्होंने उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की, जो उस दौर में हिंदी साहित्य और विचारधारा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता था। शिक्षा पूरी करने के बाद ज्ञानरंजन जबलपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध जी. एस. कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर नियुक्त हुए। उन्होंने लगभग 34 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया और 1996 में सेवानिवृत्त हुए। एक शिक्षक के रूप में भी वे बेहद प्रभावशाली थे और छात्रों को केवल पाठ्यक्रम ही नहीं, बल्कि आलोचनात्मक सोच और साहित्यिक दृष्टि भी प्रदान करते थे।
कथाकार के रूप में विशिष्ट पहचान
ज्ञानरंजन हिंदी साहित्य में नई कहानी आंदोलन के बाद के दौर के महत्वपूर्ण कथाकारों में गिने जाते हैं। उनकी कहानियां परंपरागत कथानक से हटकर वैचारिक गहराई, आत्मसंघर्ष और सामाजिक यथार्थ को सामने लाती हैं। उन्होंने कहानी को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक और बौद्धिक संवाद का सशक्त औजार बनाया। उनके अनेक कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए, जिन्होंने हिंदी कहानी को नई संवेदना और नया शिल्प प्रदान किया।
‘कबाड़खाना’ और गद्य की अनूठी शैली
उनकी गद्य रचनाओं की चर्चित पुस्तक ‘कबाड़खाना’ विशेष रूप से उल्लेखनीय मानी जाती है। यह पुस्तक हिंदी गद्य में एक अलग तरह का प्रयोग थी, जिसमें स्मृति, विचार और अनुभव का ऐसा संयोजन देखने को मिलता है जो पाठक को भीतर तक झकझोर देता है। ‘कबाड़खाना’ ने यह साबित किया कि गद्य भी उतना ही सशक्त और कलात्मक हो सकता है जितना कविता या कथा।
‘पहल’ के संपादक के रूप में योगदान
ज्ञानरंजन का योगदान केवल अपनी रचनाओं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के संपादक के रूप में हिंदी साहित्य को एक गंभीर और वैचारिक मंच प्रदान किया। ‘पहल’ ने नए लेखकों, आलोचकों और विचारकों को स्थान दिया और हिंदी साहित्य में संवाद की एक सशक्त परंपरा विकसित की। इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने साहित्य को समय की सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों से जोड़ने का प्रयास किया।
सम्मान और मान्यताएं
उनके साहित्यिक योगदान को देखते हुए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान, मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग का शिखर सम्मान और मैथिलीशरण गुप्त सम्मान प्रदान किया गया। वर्ष 2013 में जबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि देकर उनके साहित्यिक योगदान को औपचारिक मान्यता दी।
साहित्यिक विरासत और स्मृति
ज्ञानरंजन का निधन हिंदी साहित्य के लिए एक युग के अंत जैसा है। उन्होंने जो रचनात्मक और वैचारिक विरासत छोड़ी है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनी रहेगी। उनकी कहानियां, निबंध और संपादकीय दृष्टि आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं। वे उन लेखकों में थे जिन्होंने साहित्य को सत्ता, समाज और व्यक्ति के बीच संवाद का माध्यम बनाया।
साहित्य जगत में शून्य
उनके जाने से हिंदी साहित्य में जो खालीपन आया है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा। ज्ञानरंजन केवल एक लेखक नहीं थे, बल्कि एक दृष्टि थे, एक विवेक थे और एक ऐसी आवाज थे जो समय से सवाल पूछने का साहस रखती थी। हिंदी साहित्य उन्हें हमेशा एक सजग, ईमानदार और प्रतिबद्ध कथाकार के रूप में याद रखेगा।

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