February 19, 2026

राजस्व सेवा संघ ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र, कहा- सुनवाई की जगह तमाशा कर रहे मंत्री, सीएम करें हस्तक्षेप

  • मंत्री से आर-पार के मूड में राजस्व संगठन, कहा- अपमानित करने वाली भाषा नहीं चलेगी, सुधार नहीं हुआ तो करेंगे सामूहिक बहिष्कार

पटना। बिहार में जनता दरबार की कार्यप्रणाली को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा द्वारा आयोजित जनता दरबार में अधिकारियों के साथ किए जा रहे व्यवहार को लेकर बिहार राज्य राजस्व सेवा संघ ने गंभीर आपत्ति जताई है। संघ ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है और कहा है कि सुनवाई के नाम पर अफसरों का सार्वजनिक अपमान किया जा रहा है, जो न केवल प्रशासनिक मर्यादाओं के खिलाफ है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों को भी ठेस पहुंचाता है।
मुख्यमंत्री को भेजा गया पत्र और आरोप
राजस्व सेवा संघ की ओर से भेजे गए पत्र में कहा गया है कि जनता दरबार में अफसरों के साथ जिस तरह की भाषा और व्यवहार अपनाया जा रहा है, वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। पत्र में आरोप लगाया गया है कि डिप्टी सीएम द्वारा अफसरों को जनता के सामने डांटा जा रहा है, धमकियां दी जा रही हैं और ‘खड़े-खड़े सस्पेंड कर देंगे’ जैसे वाक्य बोले जा रहे हैं। संघ का कहना है कि इस तरह के बयान सुनवाई नहीं, बल्कि तमाशा बनते जा रहे हैं।
सार्वजनिक मंच पर अपमान का आरोप
संघ का आरोप है कि जनता दरबार के दौरान अधिकारियों को सार्वजनिक मंच पर कठघरे में खड़ा किया जाता है। ‘डीएम सुन रहे हो ना’, ‘एसपी जवाब दो’, ‘अब काम लटकाया तो ठीक नहीं होगा’ जैसी भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे अधिकारियों की गरिमा को ठेस पहुंचती है और जनता के बीच प्रशासन की छवि खराब होती है। संघ का कहना है कि यह तरीका न तो संवैधानिक है और न ही प्रशासनिक अनुशासन के दायरे में आता है।
ऑन द स्पॉट फैसलों पर सवाल
पत्र में इस बात पर भी आपत्ति जताई गई है कि जनता दरबार में ‘ऑन द स्पॉट’ फैसले लेने की बात कही जा रही है। संघ का कहना है कि किसी भी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत होती है, जिसमें जांच, जवाब और नियमों का पालन जरूरी होता है। सार्वजनिक मंच पर तुरंत फैसला सुनाना कानून, संविधान और न्यायिक प्रक्रिया की भावना के खिलाफ है।
लोकप्रियता के लिए की जा रही राजनीति का आरोप
राजस्व सेवा संघ ने आरोप लगाया है कि यह पूरा तरीका प्रशासन सुधार से ज्यादा व्यक्तिगत लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास प्रतीत होता है। संघ का कहना है कि मंत्री द्वारा मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से अधिकारियों को भ्रष्ट, अयोग्य और नाकारा बताने की कोशिश की जा रही है। इससे जनता के बीच यह संदेश जाता है कि पूरा राजस्व प्रशासन दोषी है, जबकि सच्चाई कहीं अधिक जटिल है।
भूमि विवाद की जटिलता पर संघ का पक्ष
संघ ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि भूमि विवाद और भूमि सुधार की समस्याएं दशकों पुरानी हैं। आजादी के बाद से अब तक कई कानून, योजनाएं और अभियान चलाए गए, लेकिन समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हो सकीं। इसके बावजूद हर बार जिम्मेदारी फील्ड में काम कर रहे अधिकारियों पर डाल दी जाती है, जो न तो न्यायसंगत है और न ही ईमानदार सोच का परिचायक।
वरीय अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
राजस्व सेवा संघ ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि इस पूरे मामले में विभाग के कुछ वरीय अधिकारी भी मंत्री के इस रवैये का समर्थन करते नजर आ रहे हैं। संघ का कहना है कि इससे यह संदेश जाता है कि संस्थागत संरक्षण की जगह व्यक्तिगत छवि और लोकप्रियता को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे प्रशासनिक ढांचे की निष्पक्षता और मजबूती कमजोर होती है।
भाषा और मर्यादा को लेकर चेतावनी
संघ ने डिप्टी सीएम की भाषा पर कड़ी आपत्ति जताई है और कहा है कि यदि इस तरह का व्यवहार बंद नहीं हुआ, तो अधिकारी चुप नहीं बैठेंगे। पत्र में साफ चेतावनी दी गई है कि यदि अधिकारियों के सम्मान और गरिमा की रक्षा नहीं की गई, तो सामूहिक कार्य बहिष्कार जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। इससे राज्य की राजस्व व्यवस्था और भूमि से जुड़े कार्यों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भीड़तंत्र की ओर बढ़ने का आरोप
राजस्व सेवा संघ ने जनता दरबार की मौजूदा शैली को ‘जन अदालत’, ‘फील्ड ट्रायल’ और ‘ऑन द स्पॉट इंसाफ’ जैसे शब्दों से जोड़ते हुए इसे लोकतांत्रिक शासन के बजाय भीड़तंत्र की ओर इशारा बताया है। संघ ने सवाल उठाया है कि क्या इसी तरह पुलिस, न्यायाधीश, डॉक्टर या अन्य विभागों के अधिकारियों को भी सड़कों पर खड़ा कर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाएगा।
मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग
पत्र के अंत में संघ ने मुख्यमंत्री से सीधा हस्तक्षेप करने की मांग की है। संघ का कहना है कि यदि समय रहते स्थिति को नहीं संभाला गया, तो इसका असर न केवल अधिकारियों के मनोबल पर पड़ेगा, बल्कि आम जनता को मिलने वाली सेवाएं भी प्रभावित होंगी। भूमि रिकॉर्ड, दाखिल-खारिज और अन्य राजस्व संबंधी काम ठप पड़ सकते हैं।
आगे की राह और संभावित असर
इस पूरे विवाद ने प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व के रिश्तों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर सरकार जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर अधिकारी अपने सम्मान और संस्थागत प्रक्रियाओं की रक्षा की मांग कर रहे हैं। अब निगाहें मुख्यमंत्री पर टिकी हैं कि वे इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और क्या कोई ऐसा समाधान निकलता है, जिससे जनता की सुनवाई भी हो और प्रशासनिक गरिमा भी बनी रहे।

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