February 10, 2026

भारतीय रेलवे में जल्द आरएसी टिकट पर भी मिलेगा रिफंड, यात्रियों को मिलेगी बड़ी राहत

नई दिल्ली। भारतीय रेलवे से सफर करने वाले लाखों यात्रियों के लिए आने वाले दिनों में एक बड़ी राहत की संभावना बनती नजर आ रही है। संसद की लोक लेखा समिति ने रेल मंत्रालय को एक अहम सुझाव दिया है, जिसके तहत आरक्षित अगली उपलब्ध सीट यानी आरएसी टिकट पर यात्रा करने वाले यात्रियों को किराये का कुछ हिस्सा वापस देने की व्यवस्था की जा सकती है। यदि यह सिफारिश लागू होती है, तो यह रेलवे के किराया ढांचे में दशकों बाद होने वाला एक बड़ा बदलाव माना जाएगा। यह प्रस्ताव सीधे तौर पर उन यात्रियों से जुड़ा है, जो पूरा किराया चुकाने के बावजूद ट्रेन में केवल आधी बर्थ यानी साझा सीट पर यात्रा करने को मजबूर होते हैं।
आरएसी व्यवस्था पर उठे सवाल
वर्तमान में भारतीय रेलवे की आरएसी प्रणाली के तहत यात्रियों को कन्फर्म टिकट के बराबर पूरा किराया देना पड़ता है, लेकिन बदले में उन्हें पूरी बर्थ नहीं मिलती। उन्हें केवल बैठने की सुविधा या आधी बर्थ दी जाती है, जिसमें दो यात्रियों को एक ही सीट साझा करनी पड़ती है। इसी व्यवस्था पर संसद की लोक लेखा समिति ने कड़ा ऐतराज जताया है। चार फरवरी को संसद में पेश की गई लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि यदि चार्ट तैयार होने के बाद भी कोई यात्री आरएसी श्रेणी में ही रह जाता है और उसे पूरी बर्थ नहीं मिलती, तो उससे पूरा किराया वसूलना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। समिति ने सुझाव दिया है कि ऐसी स्थिति में यात्रियों को किराये का आंशिक हिस्सा लौटाया जाना चाहिए।
समिति की रिपोर्ट में क्या कहा गया
लोक लेखा समिति ने अपनी रिपोर्ट “भारतीय रेलवे में ट्रेनों के संचालन की समयबद्धता और यात्रा समय” में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। समिति का तर्क है कि जब यात्री को आधी सुविधा मिल रही है, तो भुगतान भी उसी अनुपात में होना चाहिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रेलवे को ऐसी तकनीकी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जिससे आरएसी यात्रियों को स्वतः आंशिक रिफंड मिल सके। समिति के अनुसार, यह केवल आर्थिक राहत का विषय नहीं है, बल्कि यात्रियों के साथ न्याय और सेवा की गुणवत्ता से भी जुड़ा मामला है। खासकर लंबी दूरी की यात्राओं में आधी बर्थ पर सफर करना बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए काफी असुविधाजनक साबित होता है।
मौजूदा नियम क्या कहते हैं
अभी आईआरसीटीसी के नियमों के मुताबिक, यदि आरएसी ई-टिकट को ट्रेन छूटने के निर्धारित समय से तीस मिनट पहले तक रद्द नहीं किया जाता या ऑनलाइन टिकट जमा अनुरोध यानी टीडीआर दाखिल नहीं की जाती, तो किसी भी तरह का रिफंड नहीं मिलता। यानी यात्री को आधी सुविधा मिलने के बावजूद पूरा किराया देना पड़ता है। यही कारण है कि लंबे समय से यात्रियों और उपभोक्ता संगठनों की ओर से इस व्यवस्था में बदलाव की मांग उठती रही है। अब संसदीय समिति की सिफारिश के बाद इस मांग को औपचारिक समर्थन मिला है।
नई ट्रेनों में आरएसी पर पहले ही सख्ती
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि रेलवे ने इस साल की शुरुआत से आरएसी नियमों में कुछ कड़े बदलाव किए हैं। अब वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस और अमृत भारत एक्सप्रेस जैसी कुल 13 आधुनिक ट्रेनों में आरएसी टिकट धारकों को ट्रेन में चढ़ने की अनुमति नहीं दी जा रही है। इन सेवाओं में केवल कन्फर्म टिकट वाले यात्रियों को ही सफर करने दिया जा रहा है। रेलवे का तर्क है कि इन नई ट्रेनों को बेहतर यात्री अनुभव के लिए तैयार किया गया है, इसलिए साझा बर्थ जैसी व्यवस्था को यहां लागू नहीं किया गया। हालांकि इससे उन यात्रियों की संख्या बढ़ सकती है, जिन्हें टिकट न मिलने पर यात्रा ही टालनी पड़े।
अब फैसला रेल मंत्रालय के हाथ
संसदीय समिति की सिफारिशों के बाद अब गेंद रेल मंत्रालय के पाले में है। मंत्रालय को यह तय करना होगा कि आंशिक रिफंड की गणना किस आधार पर की जाएगी और इसे यात्रियों के खातों में डिजिटल रूप से लौटाने के लिए रेलवे सूचना प्रणाली केंद्र और आईआरसीटीसी के सॉफ्टवेयर में किस तरह के बदलाव किए जाएंगे। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो टिकट चार्ट बनने के बाद सिस्टम स्वतः यह पहचान सकेगा कि कौन यात्री आरएसी में रह गया है और उसे कितनी राशि वापस करनी है।
यात्रियों के लिए क्या बदलेगा
यदि यह प्रस्ताव अमल में आता है, तो आरएसी टिकट पर यात्रा करने वाले यात्रियों को पहली बार यह महसूस होगा कि रेलवे उनकी असुविधा को गंभीरता से ले रहा है। इससे न केवल आर्थिक राहत मिलेगी, बल्कि यात्रियों का भरोसा भी मजबूत होगा। फिलहाल सभी की नजरें रेल मंत्रालय के अगले कदम पर टिकी हैं। अगर समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो आने वाले समय में ट्रेन यात्रा का अनुभव लाखों यात्रियों के लिए पहले से कहीं अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित हो सकता है। यह कदम भारतीय रेलवे को यात्री-केंद्रित सेवाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर ले जाने वाला साबित हो सकता है।

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