बिहार के विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफसर की नियुक्ति अब लिखित परीक्षा से, नई नियमावली का मसौदा तैयार
- 160 अंकों की लिखित परीक्षा और 40 अंकों का साक्षात्कार प्रस्तावित, कुलपतियों से मांगे गए सुझाव
पटना। बिहार के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। राज्य में शिक्षकों की नियुक्ति को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से नई नियमावली का मसौदा तैयार किया गया है। इस मसौदे के अनुसार अब सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति लिखित परीक्षा के माध्यम से की जाएगी। राजभवन ने इस नियमावली के मसौदे को राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के पास भेज दिया है और उनसे दस दिनों के भीतर अपने सुझाव और मंतव्य देने को कहा गया है। यदि सभी कुलपति इस प्रस्ताव पर सहमति दे देते हैं तो नई नियुक्ति प्रक्रिया को जल्द ही लागू किया जा सकता है। इससे लंबे समय से लंबित शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
लिखित परीक्षा के आधार पर होगी नियुक्ति
प्रस्तावित नियमावली के अनुसार सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति के लिए अब लिखित परीक्षा अनिवार्य होगी। चयन प्रक्रिया कुल 200 अंकों की होगी। इसमें 160 अंकों की लिखित परीक्षा और 40 अंकों का साक्षात्कार शामिल रहेगा। लिखित परीक्षा वर्णनात्मक स्वरूप की होगी। इसका उद्देश्य अभ्यर्थियों के विषय संबंधी ज्ञान, विश्लेषण क्षमता और अभिव्यक्ति कौशल का मूल्यांकन करना है। इस व्यवस्था के माध्यम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि चयन प्रक्रिया के दौरान योग्य और सक्षम अभ्यर्थियों का चयन हो सके।
साक्षात्कार में प्राध्यापक स्तर के विशेषज्ञ शामिल होंगे
नई नियमावली में साक्षात्कार की प्रक्रिया को भी स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है। इसके अनुसार साक्षात्कार समिति में शामिल सभी सदस्य प्राध्यापक स्तर के होंगे। इससे चयन प्रक्रिया को अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने का प्रयास किया जा रहा है। सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के माध्यम से की जाएगी। आयोग द्वारा लिखित परीक्षा और साक्षात्कार की प्रक्रिया पूरी करने के बाद अंतिम चयन सूची जारी की जाएगी।
आयु सीमा भी की गई निर्धारित
नई नियुक्ति व्यवस्था में अभ्यर्थियों की आयु सीमा भी निर्धारित की गई है। इसके अनुसार सहायक प्राध्यापक पद के लिए न्यूनतम आयु 23 वर्ष और अधिकतम आयु 45 वर्ष तय की गई है। इस नियमावली में अनुभव के लिए अलग से अंक देने का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। यानी चयन प्रक्रिया पूरी तरह लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर ही होगी।
पात्रता परीक्षाओं को केवल योग्यता के रूप में माना जाएगा
नई व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा, कनिष्ठ अनुसंधान फैलोशिप और डॉक्टरेट उपाधि जैसी योग्यताओं को केवल पात्रता के रूप में स्वीकार किया जाएगा। इन योग्यताओं के लिए चयन प्रक्रिया में अलग से अंक देने का प्रावधान नहीं होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी अभ्यर्थियों को समान अवसर मिले और चयन प्रक्रिया पूरी तरह मेरिट के आधार पर हो।
डॉक्टरेट उपाधि धारकों को मिल सकती है छूट
मसौदे में पात्रता से संबंधित प्रावधानों को भी स्पष्ट किया गया है। इसके अनुसार अभ्यर्थियों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करना आवश्यक होगा। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त अन्य समान स्तर की राष्ट्रीय परीक्षा अथवा बिहार सरकार द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा भी मान्य होगी। हालांकि जिन अभ्यर्थियों के पास संबंधित विषय में डॉक्टरेट की उपाधि है, उन्हें कुछ शर्तों के तहत राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा या राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा से छूट दी जा सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि उनकी डॉक्टरेट उपाधि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्धारित मानकों के अनुसार प्राप्त की गई हो। इसके अलावा जिन अभ्यर्थियों ने 11 जुलाई 2009 से पहले डॉक्टरेट कार्यक्रम में पंजीकरण कराया था, उन्हें भी निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर पात्रता परीक्षा से छूट मिल सकती है।
जल्द लागू हो सकती है नई नियमावली
राजभवन की ओर से जारी मसौदे में कहा गया है कि यदि सभी विश्वविद्यालयों के कुलपति इस नियमावली पर अपनी सहमति दे देते हैं तो इसे 12 मार्च से पहले ही लागू किया जा सकता है। हालांकि यदि कुलपतियों की ओर से किसी प्रकार के संशोधन या आपत्ति की मांग की जाती है तो इसके लागू होने में कुछ समय लग सकता है। फिलहाल विश्वविद्यालयों से प्राप्त सुझावों का इंतजार किया जा रहा है।
उच्च शिक्षा व्यवस्था को मिल सकती है मजबूती
नई नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इससे विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित हो सकेगी। लंबे समय से विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं, जिससे पढ़ाई और शोध कार्य प्रभावित हो रहा है। नई नियमावली लागू होने के बाद इन रिक्त पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इससे विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी दूर होगी और शैक्षणिक वातावरण को भी मजबूती मिलेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि स्पष्ट और पारदर्शी चयन प्रणाली से योग्य और प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों को अवसर मिलेगा। इससे राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा और मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।


