बिहार में रामनवमी से पहले नई सरकार के गठन की तैयारी, सीएम के साथ 32 मंत्री लेंगे शपथ, जदयू से दो डिप्टी सीएम
- बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री, जल्द बुलाई जाएगी एनडीए की बैठक, चुना जाएगा विधायक दल का नेता
पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि वे जल्द ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे। इसके साथ ही राज्य में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया तेज हो गई है। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर इस बात की चर्चा है कि रामनवमी तक बिहार में नई सरकार का गठन कर लिया जाएगा। इस बार पहली बार भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री बनने की संभावना भी जताई जा रही है।
राज्यसभा नामांकन के बाद तेज हुई राजनीतिक हलचल
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को राज्यसभा के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि वे मुख्यमंत्री पद छोड़ सकते हैं। हालांकि भाजपा और जनता दल यूनाइटेड दोनों ही दल इस प्रक्रिया को जल्दबाजी में पूरा करने के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। जानकारी के अनुसार राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया 16 मार्च तक चलेगी, जबकि नए राज्यसभा सदस्य 9 अप्रैल के बाद शपथ लेंगे। ऐसे में सरकार गठन को लेकर लगभग एक महीने का समय अभी शेष है। नई सरकार के गठन से पहले दोनों दल अपने-अपने विधायक दल की बैठक बुलाएंगे। इन बैठकों में विधायक दल का नेता चुना जाएगा। इसके बाद गठबंधन के सभी दलों की संयुक्त बैठक होगी, जिसमें एनडीए के विधायक दल का नेता चुना जाएगा। इसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पद से इस्तीफा देंगे और नया नेता राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश करेगा।
32 मंत्रियों के साथ बन सकती है नई सरकार
सूत्रों के अनुसार नई सरकार का गठन इस बार पूर्ण रूप से विस्तारित मंत्रिमंडल के साथ किया जा सकता है। तीन महीने पहले जब नीतीश कुमार ने सरकार बनाई थी तब उनके साथ 26 मंत्रियों ने शपथ ली थी। अब संभावना है कि कुल 32 मंत्रियों के साथ नई सरकार गठित की जाएगी। मंत्रियों के बंटवारे को लेकर भी प्रारंभिक चर्चा सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि भाजपा और जदयू को 14-14 मंत्री पद मिल सकते हैं। इसके अलावा लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को दो मंत्री पद दिए जाने की संभावना है। वहीं राष्ट्रीय लोक मोर्चा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को एक-एक मंत्री पद मिल सकता है। दोनों प्रमुख दलों की ओर से नए चेहरों को मौका देने की भी चर्चा है, हालांकि इस विषय पर फिलहाल कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
स्पीकर और गृह विभाग को लेकर खींचतान
सरकार गठन से पहले ही कुछ अहम पदों को लेकर दोनों प्रमुख दलों के बीच खींचतान की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। जदयू ने विधानसभा अध्यक्ष और गृह विभाग पर अपनी दावेदारी जताई है। अभी मुख्यमंत्री पद जदयू के पास है, जबकि विधानसभा अध्यक्ष का पद भाजपा के पास है। मौजूदा सरकार में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास गृह विभाग भी है। जदयू इसी आधार पर इन पदों पर दावा कर रहा है। हालांकि भाजपा इन दोनों पदों को अपने पास रखना चाहती है। वर्ष 2005 के बाद पहली बार गृह विभाग भाजपा के पास आया है, इसलिए पार्टी इसे छोड़ने के पक्ष में नहीं है। वहीं विधानसभा अध्यक्ष का पद भी सरकार को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण माना जाता है।
मुख्यमंत्री पद को लेकर कई नामों की चर्चा
बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने की संभावना को लेकर कई नाम चर्चा में हैं। इनमें सबसे प्रमुख नाम मौजूदा उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का बताया जा रहा है। सम्राट चौधरी कोइरी समुदाय से आते हैं, जबकि नीतीश कुमार कुर्मी समाज से हैं। बिहार की राजनीति में इन दोनों समुदायों को मिलाकर ‘लव-कुश’ समीकरण कहा जाता है। राज्य में कोइरी और कुर्मी समुदाय की आबादी लगभग सात प्रतिशत के आसपास मानी जाती है। सम्राट चौधरी को राजनीति और प्रशासन दोनों का अनुभव है। वे राबड़ी देवी सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री रह चुके हैं और मौजूदा समय में दो बार उपमुख्यमंत्री का पद संभाल चुके हैं। उनकी आक्रामक राजनीतिक शैली को भाजपा के भीतर उनकी ताकत माना जाता है। हालांकि दूसरी पार्टियों से भाजपा में आने के कारण कुछ पुराने भाजपा नेताओं का विरोध भी उनके सामने एक चुनौती माना जाता है।
विजय सिन्हा भी संभावित दावेदार
मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरों में दूसरे उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा का नाम भी चर्चा में है। विजय सिन्हा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भरोसेमंद नेता माना जाता है। उन्होंने संघ के माध्यम से ही भाजपा की राजनीति में प्रवेश किया था और उन्हें पार्टी का मूल कार्यकर्ता माना जाता है। विजय सिन्हा वर्ष 2010 से लगातार लखीसराय विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतते आ रहे हैं। वे बिहार विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं और बाद में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी निभा चुके हैं। वर्तमान में वे उपमुख्यमंत्री के पद पर हैं और एक सख्त प्रशासक के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं। हालांकि उनकी जातीय पृष्ठभूमि भूमिहार समुदाय से होने के कारण इसे कुछ राजनीतिक विश्लेषक चुनौती भी मानते हैं, क्योंकि बिहार की राजनीति पिछले कई दशकों से पिछड़े वर्ग के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
अत्यंत पिछड़ा वर्ग के चेहरे की भी चर्चा
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में किसी अत्यंत पिछड़ा वर्ग के नेता को आगे बढ़ाकर सभी को चौंका सकती है। बताया जाता है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हालिया पटना दौरे के दौरान अत्यंत पिछड़ा वर्ग के कुछ विधायकों से मुलाकात भी हुई थी। इससे इस संभावना को और बल मिला है कि भाजपा सामाजिक समीकरण को साधने के लिए नया प्रयोग कर सकती है।
जदयू में नई पीढ़ी को आगे लाने की संभावना
दूसरी ओर यह भी चर्चा है कि नीतीश कुमार सक्रिय राजनीति से कुछ दूरी बनाकर अपने बेटे निशांत कुमार को पार्टी और संगठन की जिम्मेदारी दे सकते हैं। निशांत कुमार अब तक राजनीति से दूर रहे हैं, लेकिन वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव के समय से वे राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय दिखाई देने लगे हैं। इसके अलावा जदयू के वरिष्ठ नेता विजय चौधरी को भी पार्टी के भीतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला नेता माना जाता है। उन्हें नीतीश कुमार का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता है और वे कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। अपनी शांत और संतुलित कार्यशैली के कारण वे पार्टी और सरकार दोनों में प्रभावशाली माने जाते हैं। बिहार की राजनीति आने वाले दिनों में बड़े बदलाव के दौर से गुजरने वाली है। मुख्यमंत्री पद को लेकर अंतिम फैसला एनडीए की बैठक में होगा, लेकिन इतना तय है कि रामनवमी से पहले राज्य में नई सरकार का गठन हो सकता है और बिहार को एक नया मुख्यमंत्री मिलने की संभावना मजबूत हो गई है।


