नीतीश मंत्रिमंडल में अभी भी 9 मंत्री पद खाली, भाजपा और जदयू का कोटा, आगामी समय में होगा विस्तार

पटना। बिहार में नई सरकार के शपथ ग्रहण के साथ ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। गुरुवार को पटना के गांधी मैदान में आयोजित भव्य समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत एनडीए घटक दलों के 26 मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। कुल 27 सदस्यों (मुख्यमंत्री सहित) ने कैबिनेट में जगह पाई। हालांकि निर्धारित नियमों के मुताबिक बिहार मंत्रिमंडल में कुल 36 सदस्य हो सकते हैं, ऐसे में अभी भी 9 मंत्री पद खाली हैं, जिन्हें आने वाले दिनों में भरा जाना है। इन खाली पदों को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हैं।
कैबिनेट का आकार और संवैधानिक प्रावधान
संविधान के अनुसार 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में अधिकतम 15 प्रतिशत मंत्रियों को ही शामिल किया जा सकता है। इस हिसाब से कैबिनेट में अधिकतम 36 मंत्री बन सकते हैं। शपथ ग्रहण में 27 मंत्रियों के शामिल होने के बाद अब 9 पद शेष हैं। यह पद किसे मिलेंगे, किन जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को संतुलित किया जाएगा, इसे लेकर सियासी चर्चाएं चल रही हैं।
एनडीए की ऐतिहासिक जीत और मंत्रियों का कोटा
हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को 243 में से 202 सीटों पर जीत मिली। यह परिणाम गठबंधन के लिए अभूतपूर्व रहा। सामान्यतया प्रत्येक छह विधायकों पर एक मंत्री का फार्मूला माना जाता है। इसी आधार पर सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी, जिसके पास 89 विधायक हैं, को 16 मंत्रियों का अधिकार मिलना चाहिए। जदयू, जिसके पास 76 विधायक हैं, उसे 15 मंत्रियों का कोटा मिलता है। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को 2 मंत्री पद मिल चुके हैं। जीतनराम मांझी की हम पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो को एक-एक मंत्री पद का अधिकार मिला है, जो पूरा हो चुका है।
भाजपा और जदयू का रिक्त कोटा
नीतीश कैबिनेट में भाजपा के 14 मंत्री शपथ ले चुके हैं, जबकि उसके दो पद अभी खाली हैं। यह दोनों पद आगामी विस्तार में शामिल किए जाएंगे। दूसरी ओर जदयू का कोटा सबसे अधिक रिक्त है। 15 में से केवल 9 मंत्रियों ने ही शपथ ली है। यानी जदयू के 6 मंत्री पद फिलहाल खाली हैं। इसका मतलब है कि जदयू के भीतर कई नेताओं के लिए मंत्री बनने का अवसर अभी भी मौजूद है। पार्टी के पुराने नेताओं के साथ-साथ कई नए चेहरों की भी दावेदारी बढ़ चुकी है।
लोजपा (रामविलास), हम और रालोमो का हिस्सा
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को मिलने वाला दो पदों का कोटा पहले ही भर चुका है। हम और रालोमो, जिन्हें एक–एक पद का कोटा निर्धारित था, वे भी पूरा हो चुके हैं। इसलिए कैबिनेट विस्तार में इन दलों को नई जगह मिलने की संभावना नहीं है।
राजनीतिक समीकरण और संभावनाएँ
कैबिनेट विस्तार के दौरान यह देखना दिलचस्प होगा कि जदयू अपने 6 रिक्त पदों के लिए किन नेताओं को तरजीह देती है। पार्टी के भीतर दलित, अत्यंत पिछड़ा, अगड़ा और अल्पसंख्यक वर्गों के प्रतिनिधित्व को संतुलित करने की मांग उठ रही है। इसी तरह भाजपा भी अपने बचे दो पदों पर अंतिम निर्णय संगठनात्मक ताकत और जातीय संतुलन को ध्यान में रखकर लेगी। चिराग पासवान की पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में एनडीए के भीतर एक मजबूत युवा नेतृत्व के रूप में अपनी जगह बनाई है, इसलिए उनके कोटे पर होने वाली नियुक्तियाँ भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
विभागों के बंटवारे पर बढ़ी चर्चा
कैबिनेट गठन के तुरंत बाद एक और बड़ी चर्चा मंत्रालयों के आवंटन को लेकर शुरू हो गई है। गृह, वित्त, सड़क निर्माण, ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बड़े विभाग किस दल और किन नेताओं को मिलेंगे, इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में खासी हलचल है। परंपरागत रूप से नीतीश कुमार अपने करीबी और अनुभवी नेताओं को अहम विभाग सौंपते हैं, जबकि सहयोगी दलों को उनकी राजनीतिक शक्ति और समर्थन आधार के हिसाब से जगह दी जाती है।
एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन की परीक्षा
नए मंत्रिमंडल का विस्तार केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा भी है। एनडीए में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन मुख्यमंत्री जदयू से होने के कारण गठबंधन में संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक शैली के लिए जाने जाते हैं, जिसमें वे सभी सहयोगियों को संतुलित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश करते हैं। इस बार भी उम्मीद की जा रही है कि वे क्षेत्रीय और जातीय प्रतिनिधित्व का ध्यान रखेंगे ताकि गठबंधन के भीतर सामंजस्य बना रहे। नीतीश कुमार की 10वीं शपथ के साथ बिहार में एनडीए सरकार की नई शुरुआत हो चुकी है। लेकिन आने वाले दिनों में होने वाला कैबिनेट विस्तार यह तय करेगा कि सरकार का शक्ति संतुलन किस दिशा में आकार लेता है। जदयू के छह रिक्त पद और भाजपा के दो रिक्त पद इस विस्तार को और अधिक राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं। जातीय और क्षेत्रीय संतुलन के साथ-साथ भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर ही मंत्रियों का चयन होगा। यह विस्तार न केवल सरकार की मजबूती को तय करेगा, बल्कि अगले पांच वर्षों की राजनीतिक दिशा भी निर्धारित करेगा।

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