पश्चिम बंगाल में लौटा निपाह वायरस: 2 संदिग्ध मरीज मिले, अलर्ट जारी
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में एक बार फिर निपाह वायरस को लेकर चिंता बढ़ गई है। राज्य में दो संदिग्ध मामलों के सामने आने के बाद न केवल राज्य सरकार बल्कि केंद्र सरकार भी सतर्क हो गई है। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि साल 2001 के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के संदिग्ध संक्रमण की जानकारी सामने आई है। वायरस की प्रकृति, इसकी उच्च मृत्यु दर और तेजी से फैलने की क्षमता को देखते हुए इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
स्थिति की गंभीरता और शुरुआती संकेत
स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार, 11 जनवरी को एम्स कल्याणी में दो मरीजों में निपाह वायरस संक्रमण के संदिग्ध संकेत मिले। ये दोनों मरीज उसी अस्पताल में कार्यरत नर्स हैं और फिलहाल वहीं उपचाराधीन हैं। शुरुआती जांच में निपाह वायरस की आशंका जताई गई, जिसके बाद अतिरिक्त सतर्कता और विस्तृत जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि यह वायरस अत्यंत घातक हो सकता है, इसलिए किसी भी संभावित मामले को हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है।
केंद्र सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया
संदिग्ध मामलों की जानकारी मिलते ही केंद्र सरकार हरकत में आ गई। स्थिति का आकलन करने और राज्य सरकार को तकनीकी सहयोग देने के लिए एक नेशनल जॉइंट आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम को पश्चिम बंगाल भेजा गया है। इस टीम में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत वन्यजीव प्रभाग के विशेषज्ञ शामिल हैं। इन संस्थानों की भूमिका वायरस की पहचान, इसके स्रोत का पता लगाने और आगे फैलाव को रोकने की रणनीति तय करने में बेहद अहम मानी जाती है।
राज्य सरकार की भूमिका और निगरानी
राज्य की मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि सरकार पूरी स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों संदिग्ध मरीज नर्स हैं और यह पता लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं कि वे निपाह वायरस के संपर्क में कैसे आईं। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, दोनों नर्सें हाल के दिनों में पूर्व बर्धमान जिले के बर्धमान क्षेत्र की यात्रा कर चुकी थीं। इसी वजह से उन इलाकों में भी जांच और निगरानी बढ़ा दी गई है।
कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और क्षेत्रीय जांच
संभावित संक्रमण के दायरे को सीमित करने के लिए कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर विशेष जोर दिया जा रहा है। उत्तर 24 परगना, पूर्व बर्धमान और नदिया जिलों में उन सभी लोगों की पहचान की जा रही है, जो हाल के दिनों में इन दोनों नर्सों के संपर्क में आए थे। इसके साथ ही उन स्थानों की भी जांच की जा रही है, जहां वे कार्यरत थीं या यात्रा के दौरान रुकी थीं। राज्य सरकार ने आपात स्थिति से निपटने के लिए तीन हेल्पलाइन नंबर भी सक्रिय किए हैं, ताकि आम लोग किसी भी तरह की जानकारी या लक्षण की सूचना तुरंत दे सकें।
निपाह वायरस क्या है और कैसे फैलता है
निपाह वायरस एक जूनोटिक वायरस है, यानी यह जानवरों से इंसानों में फैल सकता है। इसका मुख्य प्राकृतिक स्रोत फल खाने वाले चमगादड़ होते हैं, जिन्हें फ्लाइंग फॉक्स भी कहा जाता है। ये चमगादड़ संक्रमित फल या उनके रस के माध्यम से वायरस फैलाते हैं। इसके अलावा सूअर और कुछ अन्य घरेलू जानवर भी संक्रमण के माध्यम बन सकते हैं। कई मामलों में मानव से मानव में संक्रमण भी देखा गया है, खासकर तब जब संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में कोई आता है।
लक्षण, जोखिम और मृत्यु दर
निपाह वायरस संक्रमण के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य होते हैं, जैसे बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द और थकान। यही कारण है कि शुरुआती पहचान चुनौतीपूर्ण हो जाती है। गंभीर मामलों में यह संक्रमण एन्सेफलाइटिस, यानी मस्तिष्क की सूजन का कारण बन सकता है, जिससे भ्रम, दौरे और कोमा तक की स्थिति पैदा हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इस वायरस की मृत्यु दर 40 से 75 प्रतिशत तक हो सकती है, जो इसे बेहद खतरनाक बनाती है।
इलाज, रोकथाम और सावधानियां
फिलहाल निपाह वायरस के लिए कोई विशेष दवा या टीका उपलब्ध नहीं है। इलाज मुख्य रूप से लक्षणों के प्रबंधन और सहायक देखभाल पर आधारित होता है। वायरस के फैलाव को रोकने के लिए सख्त संक्रमण नियंत्रण उपाय अपनाना आवश्यक है। इसमें व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों का उपयोग, अस्पतालों और सतहों का नियमित कीटाणुशोधन, बीमार जानवरों से दूरी बनाए रखना और प्रकोप वाले क्षेत्रों में अनावश्यक यात्रा से बचना शामिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे ही तंत्रिका संबंधी लक्षण दिखाई दें, तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना जीवनरक्षक साबित हो सकता है। पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के संदिग्ध मामलों ने स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी दी है। समय पर पहचान, प्रभावी निगरानी और जन-जागरूकता के जरिए ही इस संभावित खतरे को नियंत्रित किया जा सकता है।


