February 20, 2026

मकर संक्रांति को लेकर पंचांगों में एकमत नहीं : दो दिन मनेगा पर्व

  • मिथिला पंचांग में 14 तो बनारसी में 15 जनवरी को

पटना। मकर संक्रांति पर्व को लेकर पंचांगों में एकमत नहीं होने से इस बार यह त्योहार दो दिन मनेगा। मिथिला के विश्वविद्यालय पंचांग के अनुसार सूर्यदेव का राशि परिवर्तन 14 जनवरी को दोपहर 02:30 बजे हो रहा है तथा संक्रांति का पुण्यकाल 6 घंटे पहले से शुरू हो जाता है, इसीलिए 14 जनवरी को प्रात: 08:30 बजे से पुण्यकाल शुरू होकर संक्रांति काल तक रहेगा। वहीं काशी के महावीर पंचांग के मुताबिक सूर्य का राशि परिवर्तन 14 जनवरी के रात्रि 08:34 बजे होने से इसका पुण्यकाल शनिवार 15 जनवरी को मध्याह्न काल तक रहेगा, इसीलिए मकर संक्रांति का पर्व 15 को मनाना चाहिए। मकर संक्रांति के बाद सूर्य उत्तरायण हो जायेंगे। इसके बाद हिन्दू धर्मावलंबियों के सभी शुभ मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे।
मकर संक्रांति पर स्नान-दान की महत्ता
आचार्य राकेश झा के अनुसार मकर संक्रांति पर गंगा स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। इस दिन को सुख और समृद्धि का दिन माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन गंगा स्नान करने से एक हजार अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है तथा तिल का दान व इससे निर्मित सामग्री ग्रहण करने से कष्टदायक ग्रहों से छुटकारा मिलता है। गंगा स्नान और दान-पुण्य से परिवार में सुख और शांति बनी रहती है। मकर संक्रांति को भगवान सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात के तौर पर माना जाता है।
मकर संक्रांति में तिल व खिचड़ी की प्रधानता
पंडित झा ने बताया कि मकर राशि के स्वामी शनि और सूर्य के विरोधी राहू होने के कारण दोनों के विपरीत फल के निवारण के लिए तिल का खास प्रयोग किया जाता है। उत्तरायण में सूर्य की रोशनी में और प्रखरता आ जाती है। तिल से शारीरिक, मानसिक और धार्मिक उपलब्धियां हासिल होती हैं। तिल विष्णु को अत्यंत प्रिय है और यह गर्म भी होता है। तिल के दान और खिचड़ी खाने से बैकुंठ पद की प्राप्ति होती है। ठंड के बाद गर्म होने से चर्म रोग होने की संभावना से तिल का सेवन किया जाता है। तिल तैलीय होने के कारण शरीर को निरोग रखता है।

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