February 11, 2026

विधान परिषद में जदयू ने अपनी ही सरकार पर खड़े किए सवाल, नीरज कुमार ने उठाया अल्ट्रासाउंड का मामला

  • पटना के गार्डिनर अस्पताल में 1 साल से अल्ट्रासाउंड जांच बंद, स्वास्थ्य मंत्री से मांगा जवाब

पटना। बिहार विधान परिषद के बजट सत्र के दूसरे दिन सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने से राजनीतिक माहौल गरमा गया। जदयू के एमएलसी नीरज कुमार ने स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी करते हुए पटना के गार्डिनर रोड अस्पताल में पिछले एक साल से बंद पड़ी अल्ट्रासाउंड जांच सेवा का मुद्दा जोरशोर से उठाया। खास बात यह रही कि सवाल विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि खुद सत्तापक्ष के सदस्य की ओर से आया, जिससे सदन में सरकार की असहजता साफ नजर आई।
विधान परिषद में उठा गंभीर मुद्दा
प्रश्नकाल के दौरान नीरज कुमार ने कहा कि गार्डिनर रोड अस्पताल राजधानी के बीचों-बीच स्थित एक प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य संस्थान है। इसके बावजूद यहां अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच सुविधा पिछले एक साल से बंद है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि सीधे तौर पर मरीजों के हितों के खिलाफ भी है। नीरज कुमार ने सवाल किया कि जब समस्या इतनी गंभीर है तो स्वास्थ्य विभाग अब तक इस पर ठोस कदम क्यों नहीं उठा सका।
मरीजों की परेशानी पर चिंता
नीरज कुमार ने सदन में यह भी कहा कि अल्ट्रासाउंड जांच के अभाव में गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों को निजी जांच केंद्रों की ओर रुख करना पड़ रहा है। इससे उन पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि राजधानी जैसे शहर में यदि सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी तो फिर आम लोगों का सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से भरोसा उठना स्वाभाविक है।
रेडियोलॉजिस्ट की कमी पर सवाल
स्वास्थ्य विभाग की ओर से अल्ट्रासाउंड सेवा बंद होने का कारण रेडियोलॉजिस्ट की कमी बताया गया है। इस पर नीरज कुमार ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे घोर आश्चर्य का विषय बताते हुए कहा कि मरीजों की जांच में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। उनका कहना था कि अल्ट्रासाउंड मशीन केवल एक उपकरण है, लेकिन प्रशिक्षित रेडियोलॉजिस्ट के बिना इसका कोई मतलब नहीं रह जाता। इसलिए विभाग को पहले से ही विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए थी।
स्वास्थ्य मंत्री का जवाब
नीरज कुमार के सवालों के जवाब में स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने सदन को बताया कि विभाग लगातार चिकित्सकों की नियुक्ति की प्रक्रिया में लगा हुआ है। उन्होंने कहा कि रेडियोलॉजिस्ट के कई पद खाली हैं, लेकिन अपेक्षा के अनुरूप आवेदन नहीं आ रहे हैं। मंत्री ने कहा कि अगर आवेदन देने के लिए लोग ही नहीं आते तो नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करना मुश्किल हो जाता है।
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति, जल्द समाधान का आश्वासन
स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि गार्डिनर रोड अस्पताल में अल्ट्रासाउंड सेवा का बंद रहना एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि विभाग इस समस्या के समाधान के लिए तुरंत कदम उठाएगा। मंत्री ने कहा कि अगले कुछ सप्ताह में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी करने का प्रयास किया जाएगा, ताकि मरीजों को अल्ट्रासाउंड जैसी आवश्यक सेवाएं फिर से उपलब्ध कराई जा सकें।
सरकारी अस्पतालों की हकीकत
इस पूरे मामले ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी की समस्या को उजागर कर दिया है। पटना जैसे बड़े शहर में भी यदि मरीजों को बुनियादी जांच सुविधाओं के लिए भटकना पड़े, तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को दर्शाता है। अल्ट्रासाउंड जैसी जांच गर्भवती महिलाओं, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों और आपात स्थितियों में बेहद जरूरी होती है।
सत्तापक्ष के भीतर असंतोष के संकेत
जदयू एमएलसी द्वारा अपनी ही सरकार पर सवाल उठाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सत्तापक्ष के भीतर भी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर असंतोष है। नीरज कुमार की टिप्पणी से यह स्पष्ट हुआ कि केवल नीतियां बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारना भी उतना ही जरूरी है।
आम जनता की नजरें सरकार पर
गार्डिनर रोड अस्पताल में अल्ट्रासाउंड सेवा कब तक शुरू होगी, इस पर अब मरीजों और आम जनता की निगाहें टिकी हैं। स्वास्थ्य मंत्री के आश्वासन के बाद उम्मीद की जा रही है कि विभाग जल्द ठोस कदम उठाएगा। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब नियुक्तियों की कमी का हवाला देकर सेवाओं में देरी की बात सामने आई हो।
भविष्य की चुनौती
स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकार को न केवल डॉक्टरों की नियुक्ति प्रक्रिया को सरल और आकर्षक बनाना होगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बड़े शहरों के प्रमुख अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं कभी बाधित न हों। विधान परिषद में उठा यह मुद्दा फिलहाल तो चर्चा का केंद्र बना है, लेकिन आने वाले दिनों में सरकार के कदम ही तय करेंगे कि यह बहस महज बयानबाजी तक सीमित रहती है या वास्तव में मरीजों को राहत मिलती है।

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