बिहार में पंचायत और निकाय चुनाव लड़ने की तैयारी में जनसुराज, कार्यकर्ताओं से फीडबैक ले रहे प्रशांत किशोर
पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मिली हार के बाद जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने एक बार फिर संगठन को खड़ा करने की कवायद तेज कर दी है। चुनावी नतीजों से लगे झटके के बावजूद उन्होंने साफ संकेत दिया है कि वे बिहार की राजनीति से पीछे हटने वाले नहीं हैं। आगामी पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर जनसुराज के भीतर मंथन चल रहा है। इसी क्रम में प्रशांत किशोर राज्यभर में दौरा कर कार्यकर्ताओं और नेताओं से फीडबैक ले रहे हैं।
विधानसभा हार के बाद नई रणनीति
हालिया विधानसभा चुनाव में जनसुराज पार्टी ने 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। 236 सीटों पर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। हालांकि 35 सीटों पर पार्टी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन के समीकरण को प्रभावित किया। इसके बावजूद नतीजों ने पार्टी को बड़ा झटका दिया। अब प्रशांत किशोर संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि सही तरीके से चुनाव लड़कर जीत हासिल करना आसान नहीं होता। उन्होंने यह भी दोहराया कि पार्टी ने न तो किसी गठबंधन का सहारा लिया और न ही जाति या धर्म की राजनीति की। उनका मानना है कि उनकी लड़ाई लंबी है और इसे मुकाम तक पहुंचाने में पांच से दस वर्ष का समय लग सकता है।
बिहार नवनिर्माण यात्रा से संगठन सशक्त करने की कोशिश
प्रशांत किशोर इन दिनों बिहार नवनिर्माण यात्रा के माध्यम से लोगों के बीच जा रहे हैं। हाल ही में झंझारपुर पहुंचकर उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की और संगठन के पुनर्गठन पर चर्चा की। उनका कहना है कि जनसुराज की विचारधारा से जुड़े साथियों के सहयोग से पार्टी को नई दिशा दी जा रही है। यात्रा के दौरान वे यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वे हार से निराश नहीं हैं और संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनके अनुसार, अगर राजनीति में बदलाव लाना है तो निरंतर प्रयास जरूरी है। इसी सोच के साथ वे पंचायत और निकाय चुनाव को एक अवसर के रूप में देख रहे हैं।
क्या स्थानीय चुनाव में उतरेगी जनसुराज
बिहार में पंचायत और नगर निकाय चुनाव दलगत आधार पर नहीं होते। उम्मीदवार स्वतंत्र रूप से मैदान में उतरते हैं। हालांकि लंबे समय से यह बहस होती रही है कि स्थानीय निकाय चुनाव भी राजनीतिक दलों के आधार पर कराए जाने चाहिए। इसी संदर्भ में जनसुराज के भीतर विचार-विमर्श चल रहा है कि पार्टी को इन चुनावों में किस रूप में भाग लेना चाहिए। प्रशांत किशोर कार्यकर्ताओं से पूछ रहे हैं कि क्या जनसुराज को पार्टी के तौर पर पंचायत और नगर निकाय चुनाव में उतरना चाहिए या फिर समर्थित उम्मीदवारों के जरिए भागीदारी करनी चाहिए। उनका कहना है कि सभी जिलों का दौरा करने और जमीनी प्रतिक्रिया लेने के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा। संभावना है कि अप्रैल या मई में इस संबंध में स्पष्ट निर्णय घोषित किया जाएगा।
स्थानीय स्तर से बदलाव की सोच
प्रशांत किशोर का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती की शुरुआत गांव और वार्ड स्तर से होती है। यदि पंचायत प्रतिनिधि, मुखिया, सरपंच और वार्ड सदस्य ईमानदार और योग्य चुने जाएं, तो राजनीतिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। उनका कहना है कि स्थानीय निकायों में अच्छे लोगों की भागीदारी से राजनीति में सच्चरित्रता और पारदर्शिता आएगी। जनसुराज की रणनीति भी इसी सोच पर आधारित है। पार्टी मानती है कि यदि गांवों और नगर निकायों में उसकी विचारधारा से जुड़े प्रतिनिधि जीतते हैं, तो संगठन का जनाधार स्वतः मजबूत होगा। इससे आगामी बड़े चुनावों के लिए जमीन तैयार की जा सकेगी।
हार से सीख, आगे की तैयारी
विधानसभा चुनाव के परिणामों ने जनसुराज को यह संकेत दिया है कि जमीनी संगठन को और मजबूत करने की जरूरत है। चुनाव में व्यापक समर्थन न मिलने के बावजूद पार्टी नेतृत्व इसे अंत नहीं, बल्कि शुरुआत मान रहा है। प्रशांत किशोर का कहना है कि उन्होंने राजनीति में बदलाव के लिए कदम रखा है और यह प्रक्रिया समय लेती है। वे यह भी मानते हैं कि जाति और धर्म की राजनीति से हटकर मुद्दों के आधार पर चुनाव लड़ना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन दीर्घकाल में यही रास्ता स्थायी बदलाव लाएगा। इसी सोच के साथ पार्टी पंचायत और नगर निकाय चुनाव को एक प्रयोग के रूप में देख रही है।
आगे की राह
आने वाले महीनों में जनसुराज के लिए पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव अहम परीक्षा साबित हो सकते हैं। यदि पार्टी इन चुनावों में भाग लेने का निर्णय करती है, तो यह उसके लिए जमीनी पकड़ मजबूत करने का अवसर होगा। वहीं यदि वह प्रत्यक्ष रूप से चुनाव न लड़कर समर्थित उम्मीदवारों को समर्थन देती है, तब भी संगठनात्मक विस्तार की रणनीति जारी रहेगी। फिलहाल पार्टी नेतृत्व कार्यकर्ताओं की राय को प्राथमिकता दे रहा है। जिलों से मिले सुझावों के आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद जनसुराज के लिए यह एक नया अध्याय साबित हो सकता है, जहां स्थानीय स्तर से राजनीति की नई शुरुआत करने की कोशिश होगी।


