प्रदेश में अब दरोगा भी करेंगे साइबर अपराधों की जांच, अधिनियम में संशोधन की तैयारी, केंद्र को भेजा गया प्रस्ताव
पटना। बिहार में तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों से निपटने के लिए राज्य सरकार एक बड़ा और व्यावहारिक बदलाव करने की तैयारी में है। अब तक जिन साइबर अपराध मामलों की जांच केवल इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी करते थे, उन्हें आगे चलकर दारोगा रैंक के अधिकारियों को भी सौंपने की योजना बनाई जा रही है। इसके लिए गृह विभाग ने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा है, जिसमें भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में संशोधन की मांग की गई है। यह पहल राज्य में साइबर अपराधों की जांच को तेज, प्रभावी और व्यापक बनाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
साइबर अपराधों में तेजी और चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में बिहार में साइबर ठगी, ऑनलाइन धोखाधड़ी, सोशल मीडिया अपराध और डिजिटल माध्यम से जुड़े मामलों में तेज वृद्धि हुई है। इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग के साथ अपराधियों ने भी नए-नए तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं। नतीजा यह हुआ कि साइबर थानों पर मामलों का दबाव लगातार बढ़ता चला गया। दर्ज मामलों की संख्या के मुकाबले जांच करने वाले अधिकारियों की संख्या काफी कम पड़ने लगी, जिससे कई मामलों के निपटारे में देरी होने लगी।
वर्तमान व्यवस्था और उसकी सीमाएं
फिलहाल आईटी एक्ट से जुड़े मामलों की जांच केवल न्यूनतम इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी ही कर सकते हैं। बिहार में ऐसे लगभग 1200 से 1300 इंस्पेक्टर हैं, जो साइबर अपराधों की जांच में लगाए गए हैं। लेकिन मामलों की संख्या इतनी अधिक है कि यह व्यवस्था बोझिल साबित हो रही है। विनय कुमार ने बताया कि वर्ष 2025 में राज्य के साइबर थानों में 6319 मामले दर्ज किए गए, जबकि वास्तविक शिकायतों की संख्या इससे कहीं अधिक है।
शिकायतों के आंकड़े और बढ़ता दबाव
आंकड़ों के अनुसार केवल नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल की हेल्पलाइन पर 27.96 लाख कॉल आए। इसके अलावा 1.17 लाख ऑनलाइन शिकायतें दर्ज की गईं और इंटरनेट मीडिया व अन्य साइबर अपराधों से जुड़ी 15,218 शिकायतें सामने आईं। इसी दौरान करीब 1050 साइबर अपराधियों की गिरफ्तारी भी की गई। ये आंकड़े बताते हैं कि अपराधों की तुलना में जांच क्षमता सीमित होती जा रही है।
जांच में समय क्यों लगता है
साइबर अपराधों की जांच सामान्य आपराधिक मामलों से कहीं अधिक जटिल होती है। अधिकतर मामलों में अपराधी दूसरे राज्यों में बैठे होते हैं और पीड़ित किसी अन्य जिले या राज्य का होता है। पैसों का लेन-देन कई बैंक खातों और डिजिटल वॉलेट्स के जरिए किया जाता है। ऐसे में जांच अधिकारी को अलग-अलग राज्यों में बैंकों, टेलीकॉम कंपनियों और अन्य एजेंसियों से समन्वय करना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है। इसी कारण एक इंस्पेक्टर साल भर में औसतन छह से आठ मामलों से ज्यादा की जांच नहीं कर पाता।
दारोगा रैंक को अधिकार देने की योजना
इन्हीं व्यावहारिक दिक्कतों को देखते हुए राज्य सरकार ने दारोगा रैंक के अधिकारियों को साइबर अपराधों की जांच का अधिकार देने का फैसला किया है। बिहार में लगभग 12 से 13 हजार दारोगा रैंक के पदाधिकारी कार्यरत हैं। यदि इन्हें भी जांच का अधिकार मिल जाता है, तो अनुसंधान करने वाले अधिकारियों की संख्या लगभग दस गुना तक बढ़ जाएगी। इससे न केवल इंस्पेक्टरों पर काम का बोझ कम होगा, बल्कि मामलों की जांच भी कहीं अधिक तेजी से हो सकेगी।
आईटी एक्ट में संशोधन की जरूरत
गृह विभाग द्वारा केंद्र को भेजे गए प्रस्ताव में कहा गया है कि आईटी एक्ट में संशोधन के बाद दारोगा रैंक के अधिकारी भी न्यूनतम इंस्पेक्टर रैंक के समकक्ष साइबर अपराधों की जांच करने में सक्षम होंगे। यह संशोधन केवल अधिकार देने तक सीमित नहीं होगा, बल्कि जांच की प्रक्रिया को सरल और व्यावहारिक बनाने में भी मदद करेगा। राज्य सरकार का मानना है कि मौजूदा कानून में बदलाव किए बिना साइबर अपराधों की चुनौती से प्रभावी तरीके से निपटना मुश्किल होता जा रहा है।
मानवबल और तकनीकी क्षमता में सुधार
साइबर अपराधों के तकनीकी स्वरूप को देखते हुए राज्य सरकार साइबर थानों के मानवबल को भी मजबूत कर रही है। सभी जिलों के साइबर थानों में आईटी और कंप्यूटर बैकग्राउंड वाले पुलिस पदाधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की जा चुकी है। आने वाले समय में और अधिक तकनीकी दक्षता वाले कर्मियों की तैनाती की योजना है, ताकि डेटा एनालिसिस, बैंकिंग लेन-देन की जांच और डिजिटल साक्ष्यों के संग्रह में तेजी लाई जा सके।
पुलिस और आम लोगों को होने वाले फायदे
दारोगा रैंक के अधिकारियों को जांच का अधिकार मिलने से पुलिस तंत्र अधिक लचीला और सक्षम बनेगा। मामलों का तेजी से निपटारा होगा, पीड़ितों को जल्द राहत मिलेगी और साइबर अपराधियों पर दबाव बढ़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पुलिस के मानवबल का बेहतर उपयोग संभव होगा और तकनीकी मामलों में जांच की गुणवत्ता भी सुधरेगी। राज्य सरकार की यह पहल साइबर अपराधों के खिलाफ सख्त और दूरदर्शी कदम के रूप में देखी जा रही है। यदि केंद्र सरकार आईटी एक्ट में संशोधन को मंजूरी दे देती है, तो बिहार उन राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां साइबर अपराधों की जांच के लिए अधिक व्यापक पुलिस ढांचा मौजूद होगा। इससे न केवल अपराध नियंत्रण में मदद मिलेगी, बल्कि डिजिटल युग में नागरिकों की सुरक्षा भी मजबूत होगी।


