संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत का पाकिस्तान पर तीखा प्रहार, सिंधु जल संधि पर रुख दोहराया
- भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को घेरा, जम्मू-कश्मीर को बताया देश का अभिन्न अंग
- अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की दोटूक नीति, जवाबदेही और आतंकवाद पर उठाए गंभीर सवाल
नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 62वें सत्र में भारत ने पाकिस्तान को लेकर अपना कड़ा और स्पष्ट रुख एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखा। परिषद में भारत की प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान पर आतंकवाद को बढ़ावा देने, चरमपंथी तत्वों को संरक्षण देने और अंतरराष्ट्रीय मंचों का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते हुए तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे पर किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा तथा सिंधु जल संधि को लेकर भी भारत का रुख अपरिवर्तित है। भारत की ओर से दिया गया यह वक्तव्य उस समय सामने आया जब पाकिस्तान ने एक बार फिर जम्मू-कश्मीर और क्षेत्रीय मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने का प्रयास किया। भारत ने इन टिप्पणियों को निराधार बताते हुए कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया।
आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरा
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में अपने संबोधन के दौरान अनुपमा सिंह ने कहा कि जिस देश पर आतंकवादी संगठनों को संरक्षण देने और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के आरोप लगते रहे हैं, उसे मानवाधिकार और शांति के विषय में उपदेश देने का नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान वर्षों से आतंकवाद को एक नीति के रूप में उपयोग करता रहा है और आज वही उसके लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। भारत ने यह भी कहा कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली नीतियों का परिणाम स्वयं पाकिस्तान को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि चरमपंथ और हिंसा को संरक्षण देने वाली व्यवस्था अंततः उसी समाज के लिए खतरा बन जाती है, जिसने उसे पनाह दी होती है।
सिंधु जल संधि पर स्पष्ट संदेश
भारत की प्रथम सचिव ने सिंधु जल संधि को लेकर भी स्पष्ट टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत का दृष्टिकोण पूरी तरह स्पष्ट है और इसमें किसी प्रकार का भ्रम नहीं है। उन्होंने कहा कि दशकों पहले हुए किसी समझौते को स्थायी अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता, विशेषकर तब जब पारस्परिक विश्वास और जवाबदेही का अभाव हो। भारत ने संकेत दिया कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की सफलता दोनों पक्षों की जिम्मेदारियों और आचरण पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि केवल अधिकारों की बात करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके साथ जवाबदेही भी आवश्यक होती है।
जम्मू-कश्मीर पर दोहराया भारत का रुख
अपने वक्तव्य में अनुपमा सिंह ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी भारत की स्थापित नीति दोहराई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है तथा इस विषय पर किसी प्रकार की बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने इस्लामिक सहयोग संगठन की हालिया टिप्पणियों पर भी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी भी बाहरी संस्था या देश को भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।
पाकिस्तान पर झूठे प्रचार का आरोप
भारत ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक ही प्रकार के आरोप और दावे दोहराता है, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में पुरानी और अप्रासंगिक दलीलों के सहारे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भ्रमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने पाकिस्तान को सलाह दी कि वह पड़ोसी देशों के मामलों में अनावश्यक रुचि लेने के बजाय अपने सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करे। इससे वहां के नागरिकों को वास्तविक लाभ मिलेगा और क्षेत्रीय स्थिरता भी मजबूत होगी।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का भी उल्लेख
भारत ने अपने वक्तव्य में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का मुद्दा भी उठाया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि जम्मू-कश्मीर पर भारत की स्थिति स्पष्ट है और केवल पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों से संबंधित प्रश्नों का समाधान शेष है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राथमिकता क्षेत्र में शांति, विकास और स्थिरता सुनिश्चित करना है, लेकिन इसके लिए आतंकवाद और हिंसा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों का समाप्त होना आवश्यक है।
सिंधु नदी तंत्र का महत्व
भारत के वक्तव्य के दौरान सिंधु नदी तंत्र के महत्व का भी उल्लेख किया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान की कृषि और जल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा इसी नदी तंत्र पर निर्भर है। देश की विशाल कृषि भूमि की सिंचाई तथा जलापूर्ति का प्रमुख स्रोत सिंधु नदी प्रणाली ही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिंधु जल संधि केवल जल प्रबंधन का विषय नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग की भावना से भी जुड़ी हुई है। हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार के सहयोग के लिए पारस्परिक जिम्मेदारी और विश्वास आवश्यक शर्त है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत संदेश
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत के इस वक्तव्य को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक मजबूत कूटनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े मुद्दों पर उसका रुख दृढ़ और अटल है। विश्लेषकों का मानना है कि इस संबोधन के माध्यम से भारत ने न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा का संदेश दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने आतंकवाद और जवाबदेही के प्रश्न को भी प्रमुखता से उठाया है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर दोनों देशों की कूटनीतिक गतिविधियों पर वैश्विक समुदाय की नजर बनी रहेगी।


