पटना के पीएमसीएच समेत कई बड़े अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी, ऑपरेशन के लिए भटक रहे लोग, बेड और सुविधाएं भी नहीं
पटना। बिहार की राजधानी पटना के बड़े सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना आम मरीजों के लिए लगातार मुश्किल होता जा रहा है। राज्य के कोने-कोने से इलाज की आस लेकर आने वाले मरीजों को अब ऑपरेशन के लिए महीनों इंतजार करना पड़ रहा है। पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल, इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान और लोकनायक जयप्रकाश नारायण हड्डी अस्पताल जैसे प्रमुख संस्थानों में डॉक्टरों, बेड और ऑपरेशन थिएटर की भारी कमी ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है।
राज्य भर से आने वाले मरीजों की भीड़
पीएमसीएच, आईजीआईएमएस और एलएनजेपी अस्पताल में रोजाना हजारों मरीज पहुंचते हैं। इनमें बड़ी संख्या उन मरीजों की होती है, जिन्हें सर्जरी की जरूरत होती है। न्यूरो सर्जरी, ऑर्थोपेडिक और जनरल सर्जरी विभागों में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। डॉक्टरों का कहना है कि मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन संसाधनों में उसी अनुपात में इजाफा नहीं हुआ है। इसका नतीजा यह है कि ऑपरेशन की वेटिंग लिस्ट दिनों की नहीं, बल्कि महीनों की हो चुकी है।
गरीब मरीजों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल
सरकारी अस्पतालों पर सबसे ज्यादा निर्भर वे मरीज होते हैं, जो निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते। ऐसे मरीज महीनों तक ऑपरेशन की तारीख का इंतजार करने को मजबूर हैं। कई मामलों में यह इंतजार जानलेवा भी साबित हो सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, समय पर सर्जरी न होने से मरीज की हालत बिगड़ जाती है और बाद में जोखिम और बढ़ जाता है।
ऑपरेशन थिएटर और बेड की कमी
अस्पताल प्रशासन मानता है कि मरीजों की संख्या के हिसाब से बेड और ऑपरेशन थिएटर दोनों की भारी कमी है। एलएनजेपी हड्डी अस्पताल के निदेशक के अनुसार, मरीजों की तुलना में ओटी की संख्या बेहद कम है। 24 घंटे ऑपरेशन थिएटर संचालित नहीं हो पाने के कारण लंबी वेटिंग लिस्ट बन रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नए भवन के निर्माण के बाद 400 अतिरिक्त बेड और अधिक ऑपरेशन थिएटर मिलने से स्थिति में कुछ सुधार होगा।
मरीजों की पीड़ा की कहानियां
मैनपुरा राजापुर की एक महिला बताती हैं कि हाथ टूटने के बाद एलएनजेपी अस्पताल में उनका कच्चा प्लास्टर किया गया। एक सप्ताह बाद ऑपरेशन की बात कही गई, लेकिन दस दिन बीत जाने के बाद भी उन्हें कोई तारीख नहीं मिली। वहीं आरा के गढ़नी से आए एक युवक ने बताया कि सड़क दुर्घटना में उनकी मां का कुल्हा टूट गया। छह हजार रुपये खर्च कर निजी एंबुलेंस से पटना पहुंचे, लेकिन अस्पताल में बेड नहीं मिला। मजबूर होकर अब उन्हें दूसरे अस्पताल की तलाश करनी पड़ रही है।
आईजीआईएमएस और पीएमसीएच में लंबी कतार
आईजीआईएमएस में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। किडनी स्टोन के ऑपरेशन के लिए आफरीना तबस्सुम को 25 दिन बाद की तारीख दी गई। छपरा के जितेंद्र कुमार अपनी मां की ब्रेन सर्जरी के लिए दो महीने से भटक रहे हैं। पीएमसीएच में भी रोजाना सैकड़ों मरीज ऑपरेशन की उम्मीद में ओपीडी और वार्ड के चक्कर काटते नजर आते हैं।
डॉक्टरों की भारी कमी
समस्या सिर्फ बेड और ऑपरेशन थिएटर की नहीं है, बल्कि डॉक्टरों की कमी भी बड़ी वजह है। जानकारों के मुताबिक, पटना के मेडिकल कॉलेजों में 30 से 40 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। न्यूरोसर्जन की कमी तो और भी गंभीर है, जो 70 प्रतिशत तक बताई जा रही है। ऐसे में सीमित संख्या में मौजूद डॉक्टरों पर काम का दबाव बढ़ता जा रहा है और ऑपरेशन की संख्या बढ़ाना संभव नहीं हो पा रहा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय
महावीर वात्सल्य संस्थान के निदेशक का कहना है कि किसी भी बड़े सरकारी अस्पताल की क्षमता का आकलन उसके ऑपरेशन थिएटर की संख्या और टर्नओवर से किया जाता है। आदर्श मानक के अनुसार हर 50 सर्जिकल बेड पर एक समर्पित ऑपरेशन थिएटर होना चाहिए। उनका कहना है कि अगर पीएमसीएच जैसे अस्पताल में ऑर्थोपेडिक के 200 मरीज भर्ती हैं, तो रोज चार-पांच नहीं बल्कि 20 से ज्यादा बड़े ऑपरेशन होने चाहिए।
आगे की चुनौती
सरकारी अस्पतालों में बढ़ती भीड़ और सीमित संसाधन राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं। जब तक डॉक्टरों की भर्ती, बेड की संख्या और ऑपरेशन थिएटर की क्षमता नहीं बढ़ाई जाती, तब तक मरीजों को राहत मिलना मुश्किल है। फिलहाल हालात यह हैं कि गरीब और जरूरतमंद मरीज इलाज के लिए भटकने को मजबूर हैं और समय पर सर्जरी न होने से उनकी जान पर बन आई है।


