नीतीश कैसे हुए फिनिश: आरसीपी सिंह का ओवर कॉन्फिडेंस, ललन सिंह का ईगो, अशोक चौधरी की महत्वाकांक्षा और संजय झा की स्ट्रैटिजी

पटना। लगभग डेढ़ दशक तक भाजपा को अपने अंगूठे के नीचे दबाए रखने वाले नीतीश कुमार आज भाजपा के सामने बेबस एवं लाचार हैं। ऐसा एक दिन में नहीं हुआ है।दरअसल जब तक सुशील मोदी थे।बिहार में भाजपा से नीतीश कुमार को कोई खतरा नहीं रहा। 2017 के पुन: संधि के बाद 2019 में लोकसभा चुनाव में 40 सीट जीतने के उपरांत 2020 में जब नीतीश कुमार की पार्टी तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। समस्या तब भी बड़ी नहीं थी। शुरुआत हुई आरसीपी सिंह के अधीरता से।आरसीपी सिंह अपने ओवर कॉन्फिडेंस में अधीर होकर मोदी-शाह के इंद्रजाल में पड़कर 2021 के जुलाई में नीतीश कुमार के इच्छा के विरुद्ध,ललन सिंह के महत्व को दरकिनार करते हुए मोदी मंत्रिमंडल में शामिल हो जाते हैं।यही से शुरू होती है ललन सिंह और आरसीपी सिंह के बीच अनबन।आगे चलकर मात्र एक वर्ष के बाद आरसीपी सिंह को न सिर्फ दोबारा राज्यसभा भेजने से वंचित किया जाता है बल्कि उन्हें पार्टी से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।अब बच गए ललन सिंह। ललन सिंह का ईगो पूरा बिहार जानता है ।नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था। जबकि ललन सिंह ज्यादा लंबे अवधि से उनके साथ राजनीति में थे। ललन सिंह ने नीतीश कुमार के साथ राजनीति में संघर्ष के दिन देखे थे।जबकि आरसीपी सिंह नीतीश कुमार के जीवन में रेल मंत्री बनने के बाद आए थे।बावजूद कहने वाले कहते हैं कि सिर्फ जाति के आधार पर नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। इस पर आरसीपी मोदी-शाह से डायरेक्ट होकर मंत्री भी बन गए। ललन सिंह को बुरा लगना था तो लगा। कहा जाता है इसके बाद आहत ललन सिंह ने न सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद लिया।बल्कि सीएम नीतीश कुमार को भाजपा से अलग करके राजद- कांग्रेस के साथ ले गए। कहा जाता है बिहार विधानसभा के चालू सत्र में एक एसडीपीओ को लेकर विजय कुमार सिन्हा, जो तत्कालीन स्पीकर थे,पर सीएम नीतीश कुमार ने जो गुस्सा उतारा था। वह ललन सिंह के द्वारा दिए गए इंजेक्शन का असर भर था। लेकिन लेकिन 2023 के अक्टूबर माह से समीकरण बदलने लगे। नीतीश कुमार न जाने किन मजबूरी के अधीन होकर ना उन्होंने सिर्फ ललन सिंह से राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद लिया। बल्कि वह वापस भाजपा के साथ 2024 के फरवरी आरंभ होते-होते आ गए। कहां जाता है कि नीतीश कैबिनेट के मंत्री डॉ अशोक चौधरी के द्वारा 26 नवंबर 2023 को पटना के वेटरनरी कॉलेज ग्राउंड में आयोजित भीम संसद के बाद जदयू के अंदरखाने में नई राजनीतिक उठापटक शुरू हुई। डॉ अशोक चौधरी के महत्वाकांक्षा को निरंतर हवा मिल रही थी। सीएम नीतीश से अपने करीबियों का हवाला देते हुए ललन सिंह के रास्ते में भी वे खड़े दिखने लगे। इधर संजय झा भी जदयू की राजनीति में अपना कद बढ़ाते-बढ़ाते सीएम नीतीश कुमार को भाजपा के निकट ले जाने में कामयाब रहे।कहा जाता है कि अगर 2024 के लोकसभा तथा 2025 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के वोट बैंक का सवाल नहीं होता।तो नीतीश कुमार से सीएम की कुर्सी भाजपा पहले ही छिन चुकी होती।अब चुकीं लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव दोनों में बहुत अवधि शेष है।इसलिए बिहार में यह तख्त परिवर्तन किया गया है। यहां एक महत्वपूर्ण संदर्भ यह है कि वर्तमान विधानसभा के जो समीकरण है। उस समीकरण के तहत पलटासन का फार्मूला भी विफल है।

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