गिरिराज सिंह का तेजस्वी पर हमला, कहा- उन्हें राजनीति छोड़कर मौनी बाबा बनना चाहिए, उन्हें जनता ने नकारा
पटना। बिहार की राजनीति में एक बार फिर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव के बाद नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता तेजस्वी यादव की लंबी चुप्पी और अचानक सामने आए बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। खासकर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तेजस्वी की चुप्पी को लेकर तीखे हमले शुरू कर दिए हैं। केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद गिरिराज सिंह का बयान इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया है, जिसमें उन्होंने तेजस्वी यादव को राजनीति छोड़कर मौनी बाबा बनने तक की सलाह दे डाली।
लंबे अंतराल के बाद पटना वापसी
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद और शीतकालीन सत्र के दौरान तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी लगातार चर्चा का विषय बनी रही। चुनाव में आरजेडी और महागठबंधन को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिलने के बाद तेजस्वी यादव अचानक बिहार से बाहर चले गए थे। वे कहां गए, कितने दिन रहेंगे और कब लौटेंगे, इसे लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई। करीब 40 दिनों के बाद मकर संक्रांति से ठीक पहले 11 जनवरी को तेजस्वी यादव राजधानी पटना पहुंचे। पटना एयरपोर्ट पर जब मीडिया ने उनसे सवाल पूछने की कोशिश की, तो उन्होंने संक्षिप्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने 100 दिन तक कुछ भी न बोलने का संकल्प लिया है। इस एक वाक्य ने ही राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया।
बीजेपी का तीखा हमला
तेजस्वी यादव के 100 दिन की चुप्पी वाले बयान को भाजपा नेताओं ने अवसर के रूप में लिया। बेगूसराय पहुंचे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने इस पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि तेजस्वी यादव को मौनी बाबा बन जाना चाहिए और अपने पिता लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर 100 दिन तक प्रायश्चित करना चाहिए। गिरिराज सिंह ने यह भी कहा कि जनता ने पहले ही तेजस्वी यादव को नकार दिया है, इसलिए अब उन्हें राजनीति से दूरी बनाकर आत्ममंथन करना चाहिए। गिरिराज सिंह का यह बयान सीधे तौर पर न सिर्फ तेजस्वी यादव बल्कि पूरे राजद नेतृत्व पर हमला माना जा रहा है। उनके बयान के बाद सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई।
चुनाव हार और विदेश यात्रा पर सवाल
भाजपा नेताओं का कहना है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद तेजस्वी यादव इस सदमे को सहन नहीं कर पाए और बिहार छोड़कर विदेश यात्रा पर चले गए। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष रहते हुए उन्हें विधानसभा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन वे शीतकालीन सत्र से नदारद रहे। भाजपा का दावा है कि विपक्ष के नेता का इस तरह गायब रहना बिहार की जनता और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति गैरजिम्मेदारी को दर्शाता है।
विधानसभा सत्र में अनुपस्थिति का मुद्दा
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी तेजस्वी यादव पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि तेजस्वी यादव नेता प्रतिपक्ष तो बने, लेकिन विधानसभा के पहले ही सत्र में उनकी गैरमौजूदगी चिंता का विषय है। उनके अनुसार, चाहे बाढ़ जैसे गंभीर मुद्दे हों या अन्य जनसमस्याएं, सदन में होने वाली बहसों के दौरान तेजस्वी यादव अक्सर अनुपस्थित रहे। यही कारण है कि बिहार की जनता ने उन्हें चुनाव में नकार दिया।
राजनीतिक रणनीति या मौन साधना
तेजस्वी यादव के 100 दिन तक न बोलने के संकल्प को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी मतभेद हैं। कुछ लोग इसे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति मान रहे हैं, जिसके तहत वे फिलहाल विवादों से दूरी बनाकर भविष्य की राजनीति की तैयारी करना चाहते हैं। वहीं कुछ का मानना है कि यह चुनावी हार के बाद आत्ममंथन का दौर हो सकता है। भाजपा का कहना है कि जनता ने विपक्ष के नेता से जो अपेक्षाएं की थीं, उन पर वे खरे नहीं उतर सके। इसलिए अब चुप्पी साधने से उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
बिहार की राजनीति में बढ़ता टकराव
तेजस्वी यादव की वापसी और उनके बयान के बाद यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति और ज्यादा गर्म रहने वाली है। भाजपा लगातार विपक्ष को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि राजद की ओर से अभी इस पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। तेजस्वी यादव की चुप्पी को भाजपा ने राजनीतिक हथियार बना लिया है। गिरिराज सिंह का मौनी बाबा वाला बयान और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के सवाल इस बात का संकेत हैं कि सत्ताधारी दल विपक्ष पर दबाव बनाए रखने के मूड में है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि तेजस्वी यादव अपने 100 दिन के संकल्प के बाद किस रणनीति के साथ राजनीति में सक्रिय होते हैं और बिहार की जनता के बीच अपनी भूमिका को किस तरह नए सिरे से परिभाषित करते हैं।


